इस पाठ में जो ग्राम्य संस्कृति की झलक मिलती है वह आपके आसपास के वातावरण से कैसे भिन्न है?

इस पाठ में जो ग्राम्य संस्कृति की झलक मिलती है वह आपके आसपास के वातावरण से कैसे भिन्न है?

प्रश्न. इस पाठ में जो ग्राम्य संस्कृति की झलक मिलती है वह आपके आसपास के वातावरण से कैसे भिन्न है?

उत्तर- मैं देश के एक महानगर के अति व्यस्त और आधुनिक क्षेत्र में रहता/रहती हूँ। यहाँ का वातावरण किसी भी ग्राम्य क्षेत्र से बिलकुल भिन्न है। यहाँ चौड़ी-पक्की सड़कें हैं, जो चौबीस घंटे वाहनों से भरी रहती हैं। यहाँ आधी रात को भी सड़कों से शोर दूर नहीं होता। दिन के समय यहाँ बहुत भीड़ होती है। यहाँ सजे-सँवरे लोग दिखावे से भरा जीवन जीने की कोशिश में लगे रहते हैं।

सब तरफ़ बड़ीबड़ी दुकानें हैं; शोरूम हैं; गगनचुंबी इमारते हैं; बड़े-बड़े मल्टीप्लैक्स हैं; लंबी-लंबी गाड़ियों की भरमार है। यहाँ प्रकृति की सुंदरता नहीं है। कहीं-कहीं गमलों में कुछ पौधे अवश्य दिखाई दे जाते हैं, लेकिन पेड़ों का अभाव है। मेरे नगर से कुछ दूरी पर एक नदी है, पर वह बुरी तरह से प्रदूषित है। नगर के कारखानों का कचरा उसी में गिरता है। वास्तव में गाँव के साफ़-सुथरे वातावरण से मेरे नगर की कोई तुलना नहीं है।

यह भी जानें प्रभातियाँ मुख्य रूप से बच्चों को जगाने के लिए गाई जाती हैं। प्रभाती में सूर्योदय से कुछ समय पूर्व से लेकर कुछ समय बाद तक का वर्णन होता है। प्रभातियों का भावक्षेत्र व्यापक और यथार्थ के अधिक निकट होता है। प्रभातियों या जागरण गीतों में केवल सुकोमल भावनाएँ ही नहीं वरन् वीरता, साहस और उत्साह की बातें भी कही जाती हैं। कुछ कवियों ने प्रभातियों में राष्ट्रीय चेतना और विकास की भावना पिरोने का प्रयास किया है।

श्री शंभूदयाल सक्सेना द्वारा रचित एक प्रभाती –

पलकें, खोलो, रैन सिरानी।
बाबा चले खेत को हल ले सखियाँ भरती पानी॥
बहुएँ घर-घर छाछ बिलोती गातीं गीत मथानी।
चरखे के संग गुन-गुन करती सूत कातती नानी॥

/> मंगल गाती चील चिरैया आस्मान फहरानी।
रोम-रोम में रमी लाडली जीवन ज्योत सुहानी।
आलस छोड़ो उठो न सुखदे! मैं तब मोल बिकानी॥
पलकें खोलो हे कल्याणी॥

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