अनुकूल- प्रतिकूल परिस्थितियों में विचलित न होना- यही नियम हैं जिनका पालन करने से जीवन यज्ञमय बन जाता है।
हमें यह सीखना होगा कि इस संसार में कुछ कठिनाइयाँ हैं जो हमें सहन करनी हैं । वे पूर्व कर्मों के फलस्वरूप हमें अजेय प्रतीत होती हैं।
जहाँ कहीं भी कार्य में घबराहट, थकावट और निराशाएँ हैं, वहाँ अत्यंत प्रबल शक्ति भी कार्य कर चुकने पर एक् होना हो ।
कर्म के फल को समय की धारा में प्रवाहित हो जाने दें । अपनी शक्ति भर कार्य करें और अपना आत्मसमर्पण करें ।