किन्हीं घटनाओं में हतोत्साहित न होए । हमारा अपने ही कर्मों पर अधिकार हो सकता है। दूसरों के कर्मों से नहीं।
आलोचना न करें, आशा न भय न करें, अनुभव आता है और जाता है । पर करें, सब अच्छा ही होगा ।
साक्षात्कार संपन्न पुरुष न तो दूसरों को दोष लगाता है और न अपने को अधिक शक्तिमान वस्तुओं से आच्छादित होने के कारण वह स्थितियों की अवहेलना करता है।
जैसे हम विष या विषधर सर्प को नहीं छूते, उसी प्रकार सिद्धियों से अलग रहे और उन लोगों से भी जो इनका प्रतिवाद करते हैं।