अपने अतीत को सहन करना सबसे बड़ी क्षमा है!

  अपने अतीत को सहन करना सबसे बड़ी क्षमा है!

                         अपने अतीत को सहन करना सबसे बड़ी क्षमा है!

 “तुम सोने से पहले सबको क्षमा कर दो,
                           तुम्हारे जागने से पहले मैं तुम्हें क्षमा कर दूँगा।”
 
      आज की हर प्रतिकूलता स्वयं के अतीत के संचयकोष से ही उभरकर आई
है, अतः उसे सहना अपने अतीत को सहना ही तो है. क्या हम खुद को सहन कर पाते
हैं ? नहीं ! यदि हम सभी अपने आपको सहन कर लें तो अपने जीवन के हर तनाव
को सहन कर लेंगे स्वयं को न सहन कर पाने के कारण ही हम आवेशित हो जाते हैं,
आक्रोशित हो जाते हैं, परेशान और खिन्न हो जाते हैं, जब भीतर में उठ रहे आवेग
सहनशीलता की सीमा लांघ जाते हैं, तो हमारे भीतर की कुंठा और क्रोध बाहर
निकलने लगता है और कभी कलह, तो कभी अपराध का रूप धारण कर लेते हैं.
अपनी कुंठाएं न सह पाने पर इंसान दूसरों को शारीरिक आर्थिक हानि पहुँचाने का
प्रयास करता है, कभी-कभी वह अपने प्रतिद्वन्द्वियों और शत्रुओं की हत्या तक कर
देता है.
       बाहर अभिव्यक्त होता प्यार व घृणा-दोनों ही आन्तरिक आवेगों का परिणाम है.
प्यार फूटता है तो लोगों को अच्छा लगता है, खुद को भी और औरों को भी अगर
हमारे भीतर से स्फुटित प्रेम हमारे आस-पास के लोगों को स्वीकार्य न हो, अच्छा न
लगे तो हमें भी अपने प्रेम से घृणा करने की आदत पड़ जाएगी. जब हम अपने ही
प्रेम को घृणित मानने लग जाएंगे तो हमारे भीतर खतरनाक हिंसा जन्म ले लेगी जो
आत्मपीड़क भी बनेगी व पर-पीड़क भी. आत्मपीड़क यानि स्वयं को पीड़ा देने वाली.
अपनी प्राकृतिक आवश्यकताओं को भी नकारना शुरू कर देना भूख लगी है, किन्तु
भोजन नहीं करना, बदले में तम्बाकू, जर्दा, मसाला, शराब, अफीम इत्यादि खाकर
अपने पेट में विष को छोड़ते जाना. नींद आ रही हो, तब भी नींद नहीं लेना, टी. वी.
सेट पर दृष्टि गड़ा कर बैठ जाना, लगातार फिल्में देखते रहना व सिगरेट के कश लेते
जाना, धुआँ छोड़ते जाना. कोई हमसे बात करना चाहे तो उससे बात नहीं करना, मुँह
फेर लेना अथवा चिढ़ कर जवाब देना- ये सब आत्मपीड़ा के परिचायक हैं. निज हिंसा
है. इस निज हिंसा से ग्रस्त मानसिकता वाला व्यक्ति पूरी दुनिया को जहरीली दृष्टि
से देखता है किसी को हाथ पकड़े चलते देखकर, गले मिलते हुए देखकर आपस में
वार्तालाप करते देखकर स्वयं जलभुन जाता है. उसे सारी दुनिया कष्ट देती हुई मालूम
पड़ती है. प्रायः ऐसी मानसिकता के शीर्ष पर पहुँचा हुआ व्यक्ति आत्मघात कर जीवन
बर्बाद कर देता है. अपने साथ अपने सगे-सम्बन्धियों की जिन्दगी भी खतरे में डाल
देता है अथवा पागलपन का शिकार हो, लम्बे समय तक खुद दुःख उठाता है व परिजनों
के दुःख का कारण बनता है. ऐसे बेचैन, रुग्ण मानसिकता वाले व्यक्ति के साथ या
तो कोई विवाह करता नहीं और गलतफहमी या भूलचूक से कोई विवाह कर भी ले तो
उसे छोड़कर या उससे मुख मोड़कर जीना शुरू कर देता है. एक तरफ आन्तरिक
विकृतियों को नहीं सह पाने की पीड़ा दूसरी तरफ माहौल की प्रतिकूलता- ऐसे व्यक्ति
के जीवन को नारकीय बना देती है. ऐसे व्यक्ति स्वयं अपने आप को ही क्षमा नहीं
कर पाते. संसार में ऐसे व्यक्तियों की संख्या बहुत अधिक है जो अपनी असफलताओं के
लिए स्वयं को ही कोसते रहते हैं.
          सम्भव है कि उपर्युक्त मानसिकता आपकी अपनी हो अथवा आपके घर-परिवार
के किसी सदस्य की हो, मित्र सम्बन्धी की हो. ऐसे में यहाँ हर एक व्यक्ति को
समझदार होने की आवश्यकता है. हमें स्वयं को स्वस्थ रखने के लिए भी समझदार होना
जरूरी है, साथ ही अपने परिजनों को स्वस्थ रखने के लिए भी.
          क्या है इसका उपाय ? उपाय है- मात्र क्षमा व सद्भावना स्वयं स्वयं को
सहन करो व सबके लिए सद्भावना दुआ करो.
          क्षमा- दो अक्षर का शब्द मात्र है, लेकिन शक्ति अनन्त है. विचारणीय बात यह
है कि- “मानव का आभूषण रूप है, रूप का आभूषण गुण है, गुण का आभूषण ज्ञान
है, ज्ञान का आभूषण क्षमा है.”
          क्षमा का गुण अभ्यास के द्वारा सीखा एवं अर्जित किया जा सकता है. इसका
प्रारम्भ व्यक्ति के स्वयं के भीतर से होना चाहिए. विवेकशील वह है जो सबसे पहले
अपनी त्रुटियों का मूल्यांकन करता है. स्वयं के स्तर से भूल सुधार स्वयं को क्षमा करने
जैसा है जब हम स्वयं को संताप से मुक्त कर लेते हैं, तो दूसरों को क्षमा करने का
भाव हमारे भीतर स्वयंमेव ही उत्पन्न हो जाता है. किसी दोषी व्यक्ति को क्षमा करके
जो प्रसन्नता मिलती है, उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता.
          हम इस बात को स्वीकार करते हैं कि सबमें क्षमा का स्तर समान रूप से नहीं
पाया जाता है. ऐसे में हमें अपने भीतर क्षमा व सद्भावना को विकसित करना आवश्यक
है. इसके लिए प्रतिदिन प्रातःकालीन प्रार्थना, ध्यान में अपने लिए क्षमा गुण का आह्वान
करें.
      धरती माता को प्रणाम करके कहें कि-
वसुधा तू उपकारी गजब,
                          आधार है रे महत् सुक्
मैं जरूरत हित गात के,
                          जो कर रहा हूँ भंग तुक्
तुम सहनशीला धन्य हो,
                          मुझमें भी ऐसा गुण खिले
यदि आवश्यकता हो नहीं,
                          किंचित न तेरे प्राण लें।
    हे सत्गुरुदेव! आप हमें धरती की तरह सहनशील होने का आशीष दो, हम
अपने अन्दर बाहर को सहन कर सकें व सबके प्रति सदभावमय रह सकें, ऐसी
शक्ति दो, प्रेम दो.
          हमारा हृदय विराट हो जिसमें समस्त जीवों के प्रति प्रेम हो, किसी से कोई अपेक्षा
न हो. दुराव एवं लगाव न हो. हम सबके सहयोगी बनें व जगत् के हर सहयोग के
प्रति सदैव आभारी रहें.
             अन्त में, हम अपना अनुभव इस तरह से कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति स्वयं को
सहन नहीं कर पा रहा है तब आप उस पर आक्रोशित न हों, वरन् उसे मदद करें ताकि
वह स्वयं को समझ पाए व सुलझ पाए जो बिगड़ा है वह सुधरेगा ही, इस बात पर
अटूट विश्वास रखें. प्रेम व क्षमा हर मर्ज की दवा है, स्वयं आजमाएं व सुख पाएं.
ध्यान रखें-
              “क्षमा वीरस्म भूषणम्।”
       क्षमा करें, भूल जाएं. यही जीवन का सार है. अपने भीतर की घृणा और बदले
की भावना रूपी विष को बाहर निकालने का साधन है.

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