गंगावतरण एवं पाषाणी का कथासार

गंगावतरण एवं पाषाणी का कथासार

                          गंगावतरण एवं पाषाणी का कथासार

गंगावतरण की कथा पौराणिक है। इन्द्र की प्रेरणा से भगीरथ के पूर्वजों ने
मुनिश्रेष्ठ कपिल को अपमानित करना चाहा किन्तु महर्षि कपिल के तपोबल के ताप में उनका
अस्तित्व ही दग्ध हो गया और आश्चर्य यह कि भागीरथ के पूर्वजों का भस्मावशेष शीतल
ही नहीं हो पा रहा था। भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धारार्थ तप का अवलंबन किया। उनकी
तपोनिष्ठा के परिणामस्वरूप ही स्वर्ग की गंगा पृथ्वी पर उतरी।
        गंगावतरण भगीरथ की तनोनिष्ठा के यश:कल्प की गाथा है। उनके यशः कल्प की
यह गाथा तीन दृश्यों में विभक्त है। प्रथम दृश्य का सूत्रपात भगीरथ के उग्रतप के निश्चय
से होता है। पितरों के उद्धारार्थ तप के अतिरिक्त उनके समक्ष कोई दूसरा विकल्प नहीं है।
अतः उनका निश्चय है―
                             मैं करूंगा तप, महातप मौन-
                             ऊर्ध्व बाहु, कनिष्ठिका भर टेक-
                             भूमि पर, कंपित न हूँगा नेक !
          अपने पूर्व निश्चय को वह गंगोत्री के पुण्य-तीर्थ में कर्मणा चरितार्थ करते हैं, निराहार
तपस्या में वह निरत हैं। भगीरथ के तप की ख्याति चतुर्दिक फैली हुई है। भगीरथ के तप से
सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र सभी प्रकंपित हैं, इन्द्र को यह सूचना नारद से उपलब्ध होती है। इन्द्र
भगीरथ के उग्रतप से अत्यन्त चिन्तित हो उठते हैं। किन्तु उन्हें उर्वशी, रंभा जैसी अप्सराओं
का भरोसा है। वह अत: उर्वशी और रंभा को भगीरथ की तपस्या के स्खलनार्थ पृथ्वी पर
भेजते हैं। यह दृश्य अपनी प्रस्तावना में भगीरथ की चारित्रिक दृढ़ता एवं इन्द्र के षड्यंत्र
निश्चय से संपृक्त है।
        द्वितीय दृश्य का सूत्रपात अत्यन्त मादक वातावरण से होता है। आधी रात का समय
है, दूध की धोयी चांदनी दिक्-दिगन्त में छितराई है। उन्मादक वायु का शीतल प्रवाह
वातावरण में तंद्रिलता बिखेर रहा है। नीरव शांति का सन्नाटा चतुर्दिक व्याप्त है। ऐसे
कामोद्दीपक वातावरण में भी वह स्तूपवत् खड़े हैं। वे वातावरण से सर्वथा अलिप्त हैं। तपस्या
में निर्बाध निरत भगीरथ संकल्प-दृढ़ता के उत्कर्ष में अधीष्ठित हैं। इसीलिए अप्सराओं का
सम्मोहन भी उनके लिए निरर्थक ही सिद्ध होता है। रंभा और उर्वशी के सम्मोहन से भगीरथ
छले नहीं जाते। वे अपनी तपस्या में शान्त भाव से लीन हैं। अप्सराओं के समक्ष भगीरथ की
तपस्या विचलित नहीं होती। अप्सराओं का कामोद्दीपन भंगीरथ को रंच मात्र भी प्रभावित नहीं
कर पाता। वे निष्काम ही बने रहते हैं। धरती की तप:साधना के समक्ष देवलोक का दंभ धूमिल
हो जाता है।
              भगीरथ की तृप्तकाम निष्कामता तृतीय दृश्य में पुरस्कृत होती है। अनेक वर्ष बीत
गए किन्तु तपोनिष्ठ भगीरथ का मस्तक विचलित नहीं हुआ। तन शिराओं का बन गया, पर
मनोरथ इष्ट-सिद्धि के पूर्व कभी क्लान्त नहीं हुआ। उनके प्रबल संकल्प के सामने ब्रह्मा का
कमलासन हिल उठता है। वे ‘ब्रह्मब्रूहि’ के आश्वासन के साथ भगीरथ के समक्ष प्रस्तुत होते
हैं। वे भगीरथ को स्वर्ग का प्रलोभन देते हैं किन्तु स्वर्ग-सुख के प्रलोभन से वह छले नही
जाते। अपने पूर्वजों के उद्धारार्थ वह पृथ्वी पर गंगाअवतरण की याचना करते हैं। ब्रह्मा
कर्मफल की दुहाई देते हुए यह प्रस्तावित करते हैं कि भगीरथ के पुण्यकर्म उनके पितरों के
उद्धार में तो असम्भावना ही व्यक्त करते हैं। भगीरथ ब्रह्मा के कर्मज संस्कार को निरर्थक
सिद्ध करते हैं। कहते हैं―
  मैं उतारू पार औरों को न जो..
            धिक् तपस्या, नियम ! तब सब ढोंग तो !.
    भगीरथ के अनुसार सूर्य की व्यापकता केवल उसी तक सीमित नहीं रहती, वह सबको
प्रकाश देती है। कर्म का शीतल प्रभाव चाँदनी के रूप में सबको स्निग्धता में डुबो देता है।
फिर भगीरथ की तपस्या क्या पितरों को भी प्रभावित नहीं कर सकेगी? अतः उनकी कामना
है―
  मेरे पितर क्या ? भस्म ही उनका अरे, अब शेष,
           उनके बहाने हो हमारा पतित पावन देश !
 
        पूर्वजों का उद्धार तो एक बहाना है, भगीरथ की कामना सम्पूर्ण देश की पावनता से
संपृक्त है। ब्रह्मा भगीरथ की इस मूल्यजीविता पर ही रीझते हैं। प्रसन्नता के आह्लाद में वह
कहते हैं―
 कुल कमल राजा भगीरथ धन्य
                स्वार्थ-साधक स्वजन होते अन्य॥
                मानता, जग कर्म-तंत्र-प्रधान,
                पर भगीरथ असामान्य महान्।
                लोक-मंगल के लिए प्रण ठान-
                तप इन्होंने है किया, यह मान-
                हम, इन्हें देंगे अतुल वरदान,
                ये मनुज उत्थान के प्रतिमान।
        ब्रह्मा की धारणा में भगीरथ ‘मनुज-उत्थान के प्रतिमान’ की सिद्धि अर्जित करते हैं।
उनकी कामना है कि भगीरथ की कीर्ति-गाथा गगन चढ़े ऊपर, सबसे ऊपर फहरे, लहरे !
इस क्षण देवाधिदेव शंकर का आशिष भी भगीरथ को सुलभ होता है। भगीरथ का
शिवधर्मातप तृप्तकाम होता है। स्वर्ग की गंगा धरती पर अवतरित होती है।
                    पाषाणी की कथावस्तु पौराणिक है। रामायण की इस प्रासंगिक
प्रकरी को आचार्यशास्त्री ने प्रथमतः स्वतंत्र अस्तित्व दिया है। इसकी रचना में मनोवैज्ञानिकता
का प्राधान्य है। अहल्या के मन: द्वन्द्व के अनिर्वाह को कवि की संवेदना सुलभ है। इसीलिए
उसका व्यक्तित्व दुर्बलता में भी हेममहार्ध प्रतीत होता है। पौराणिक अहल्या का उन्मत्त यौवन
गौतम के शिथिल बाहुपास में अतृप्ति की विह्नलता से प्रताड़ित है। अतृप्त अहल्या की यह
विह्वलता अत्यन्त स्वाभाविक है। अतृप्त अहल्या का इन्द्र के प्रति रागदीप्त होना अतः
स्वाभाविक है। इन्द्र चन्द्रमा की सहायता से उसकी इस रागदीप्तता को तृप्ति देते हैं। गौतम
जब इस सत्य से परिचित होते हैं तो गौतम के शाप से चन्द्रमा को मृगचर्म का धब्बा सुलभ
होता है, इन्द्र सहस्र भाग उठते हैं और अहल्या पाषाणी में रूपायित हो उठती है।
           आचार्य शास्त्री की पाषाणी का कथा-विन्यास पौराणिक कथा से पृथक है। कवि ने
प्रत्यक्ष समागम और दारुण अभिशाप की पौराणिकता को मनोवैज्ञानिक दिशा दी है।
व्यभिचार यहाँ स्वप्न में चरितार्थ होता है और अभिशाप प्रायश्चित एवं आत्मशुद्धि के रूप
में परिवर्तित होता है। पाषाणी का कथा-विन्यास मनोवैज्ञानिक प्रतीतकात्मकता पर आधृत है।
इसकी कथावस्तु तीन दृश्यों में विभक्त है। गहराती सांझ के घुंघलके प्रथम दृश्य में अहल्या
अपने मन:द्वन्द्वों में गहरायी दीखती है। मन की चंचलता को लेकर वह अत्यन्त परेशान है।
आश्रमवासिनी राजकुमारी मल्लिका आश्रम से जाने से पूर्व उसके पास आशीर्वादार्थ आती
है। मन द्वन्द्व के क्षणों में अहल्या अपने आन्तरिक असंतोष को रोक नहीं पाती। उसका
पुण्यधर्मी कोमल यौवन आश्रम के तप-ताप में दग्ध हो गया है। अहल्या की इस मनःस्थिति
से आश्रम की शांति पर रीझने वाली मल्लिका आश्चर्यचकित हो आती है। अहल्या उसके
इस आश्चर्य पर कहती है, राजकुमारी ने तिल तिल जलनेवाली कामना की घुटन को ही
शान्ति की शीतलता समझने का भ्रम पाला है। अहल्या के जीवन-कूप में मन द्वन्द्रों का सागर
लहरा उठता है। प्रथम दृश्य की ये घटना-संवेदनाएँ कथा की प्रस्तावना मात्र है। इस प्रस्तावना
में अहल्या का अतीत-जीवन अभिव्यक्त है। अहल्या की अतृप्ति से यह ध्वनित होता है कि
उसका राजस-रस-संस्कार आश्रम की सात्विकता से सामंजस्य लाभ नहीं कर सका है।
                   द्वितीय दृश्य गौतम-अहल्या संवाद से प्रारम्भ होता है। गौतम अहल्या के
चित्त-चांचल्य और उसकी डबडबायी आँखों की पीड़ा का कारण पूछते हैं। अहल्या अश्रु-स्वर
में डूबे अपने जीवन-यौवन के पुष्पित कमल की व्यथा संकेत देती है। राजकुमारी मल्लिका
के आगमन की सूचना भी वह गौतम को देती है। गौतम उसकी अन्त: उद्वेलित व्यथा को
राजस भाव का संपर्क प्रभाव प्रमाणित करते हैं। वह उसे कात्यायनी और मैत्रेयी की कथा के
माध्यम से तप, त्याग, संयम, सात्विकता और साधना का उपदेश देते हैं। गौतम के इस
उपदेश से प्रभावित होने की अपेक्षा वह तंद्रा-विभोर हो जाती है। गौतम इसे अपनी उपेक्षा
मानते हैं। वह अपने तप-त्याग, उत्सर्ग, वैराग्य और साधना को निरर्थक समझने लगते हैं।
उनके इन उदात्त गुणों से अहल्या अप्रभावित ही रही !
            कथा-विन्यास और क्रिया व्यापार की गतिशीलता में तृतीय दृश्य में अद्भुत कसाव
वर्तमान है। अर्द्धरात्रि की नीखता में अहल्या सोई है। स्वप्न तरंगों में प्रवाहित अहल्या अपने
कल्पना-पुरुष का साक्षात्कार करती है। उसके मन का मीत देवराज उसकी उन्मत योवनता
को गुदगुदाता हुआ प्रणय-निवेदन करता है―
 तुम समा जाओ नयन में, प्राण में
                          ऋषि, ऋचे अब बदल जाओ गान में,
        ऋषि के पुकारने के तुरन्त पश्चात् अहल्या की स्वप्न-तृप्ति को झटका लगता है और
वह मानसिक स्वप्न व्यभिचार की भावना को अनदेखा करती है। वह इन्द्र के प्रणयमनुहार
की उपेक्षा करती है और स्वप्निलता में ही उसे लौट जाने का आदेश देती है। स्वप्न रसप्राप्ति
के पश्चात् वह भावात्मक उत्तेजना से भर आती है। स्वप्न की अमांगलिक शान्ति के लिए
गौतम जब इन्द्र का नाम लेते हैं तो वह पीड़ा से कराह उठती है―
इन्द्र का मत नाम लो, कर जोड़ती।
        ठीक इसी क्षण ऋषि-कुमारों का प्रातःकालीन गान वातावरण के कण-कण में स्वरित
हो उठता है। ऋषि पूजार्थ स्थित होना चाहते हैं, विक्षिप्त और भयभीत अहल्या उन्हें अपने
पास ही रहने की प्रार्थना करती है। अहल्या के इस आतंक प्रेरित निवेदन में उन्हें उसके प्रणय
निवेदन का भ्रम हो आता है। उनकी इस भावुकता पर अहल्या कुपित हो कहती है―
चेतना मेरी न रह पाई सती।
                     इन्द्र का सपना सदा मैं देखती।
          गौतम अपने प्रणय-निवेदन की भावुकता को साधना का स्खलन प्रमाणित करते हैं।
रूप-यौवन की वासनात्मक उत्तेजकता उन्हें निरर्थक प्रतीत होने लगती है। अहल्या अपनी
विवशता विज्ञापित करती कहती है―
  मैं युवति तुम जरा-जर्जरित इस बलते से सत्य को
                      धर्म ज्ञान तप बुझा न पाये, जला न पाये तथ्य को।
          ऋषि कुमारों का प्रबुद्ध गान पुनः अहल्या के कानों में गूंजता है। अपनी इस स्थिति
पर वह पश्चाताप और पीड़ा से भर आती है। अपनी अस्मिता पर वह विचार ही रही थी कि
मूर्च्छित गौतम के कण्ठ से साधना से स्खलित करनेवाली नारी की निर्ममता के लिए
‘पाषाणी’ शब्द अनायास ही उच्चरित हो उठता है। अहल्या इसे ऋषि का अभिशाप मान
प्रतिकार में नहीं नहीं करती आँसुओं में बरस पड़ती है। उसके मनःद्वन्द्व की करुण व्यथा
इन पंक्तियों में उच्छवसित होती है।
कैसे कहते पाषाणी हूँ।
         अहल्या की इस पंक्ति से ही संगीतिका का अन्त होता है। कथा की प्रभावोत्पादकता
संक्षेपत: अतृप्त तृप्ति एवं तृप्ति अतृप्ति के अन्तर्द्वन्द्वों की कहानी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *