“बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि लेय”

“बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि लेय”

                       “बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि लेय”

“जो बीत गया, उसका तनिक शोक नहीं करना चाहिए, भविष्य में क्या होगा इसकी व्यर्थ चिंता भी नहीं करनी चाहिए. जो वर्तमान काल का सदुपयोग करते हैं, वे असाधारण व्यक्ति होते हैं. इसलिए हर किसी को वर्तमान का ही सदुपयोग करना
चाहिए, क्योंकि बीता हुआ समय और भविष्य पर हमारा कोई जोर नहीं होता है.”
                                                                        
 
वास्तव में “बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि लेय’ एक सिर्फ लोकोक्ति भर नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण मानव के लिए जीवन जीने हेतु खूब गूढ, सारगर्भित एवं बहुमूल्य संदेश भी है, जिससे प्रेरित होकर मानव जीवन बीती बातों को भुलाकर आगे
के जीवन व्यतीत करने हेतु वर्तमान की धरातल पर नींव रख भविष्य का भी निर्माण सम्भवतः जरूर कर लेता है. अतः भविष्य निर्माण के लिए मानव को अतीत से जरूर सीखना ही चाहिए, यथार्थ के धरातल पर सम्पूर्ण पुरुषार्थ जरूर करना ही चाहिए. सत्य बात है कि अतीत मृत है, यथार्थ जीवंत (सजीव) है, जबकि कल्पना लोक तो यथार्थ का संहारक कार्य करता है.”
               ‘बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि लेय’ में निहित बेजोड़ शक्ति की मणि रूपी ध्वनि अतीत, वर्तमान और भविष्य इन तीनों को सुव्यवस्थित प्रबंधन की ओर जरूर इगित करती है. अर्थ बिलकुल स्पष्ट है कि बीती बातों को भुला दें. तमाम विद्वानों का
भी मानना सत्य प्रतीत रहा है कि-‘स्मृति वरदान है, तो विस्मृति एक प्रकार का प्रसाद है. हमारे धर्म ग्रंथों में जिसे भी देवतागण माना उन सबों में भुला देने का बड़ा विराट भाव रहा है. ‘आगे की सुधि लेय’ शब्द भविष्य के कुशल-क्षेम की ओर इशारा करता है. युग-युगान्तर में भी हमारे आराध्य देवों ने लोकहित के भावों से अप्रिय या घोर
अप्रिय हालातों को यथासम्भव बिसारने का ही संदेश प्रसारित दिया है. समय हो या व्यक्ति, जो गुजर कर चला गया, वह पुनः वापस लौट कर नहीं आता. इस दृष्टि से सोचें और देखें-परखें, तो बीते हुए के लिए पाश्चाताप करने से केवल हानि होती है, किसी विद्वान ने बहुत ही ठीक कहा है-
            “गतं न शोचामि कृतम् न मन्ये।” अर्थात् जो बात हो चुकी हो उस पर चिन्ता करना. खेद करना, रोना-धोना आदि ऐसे कार्य व्यर्थ करना होता है. कवि तुलसीदास जी ने स्पष्ट लिखा है-
                     “का वरषा जब कृषि सुखाने,
                     समय चूकि पुनि का पछिताने।”
 
जो समय एक बार चूक गया, फिर आप कितना भी पश्चाताप कीजिए कोई भी लाभ नहीं हो सकता है. समय की गति पहचान तदनुकूल आचरण करना तथा आगे बढ़ना ही सफलता का सच्चा मार्ग है. पाश्चाताप करना तो एक गलती के ऊपर दूसरी गलती करना हमें अतीत की अनुभवों से आने वाला कल का मार्ग जरूर दिखाता है. भगवान श्रीकृष्ण जी ने भी सत-रज-तम ये तीनों से ऊपर उठकर स्थिति प्रज्ञ (स्थिर या स्थायी बुद्धि) तक पहुंचने का पूर्ण संदेश बताया है. ‘बिसारना’ तो नकारात्मक घटनाओं एवं अन्य ऐसे परिदृश्यों के अधकार रूपी कोठरी से निकलकर नई रोशनी वाली मंजिल की तलाश का स्वरूप है. इसके लिए बस श्रेष्ठ चितन-मनन, योग- प्राणायाम और सक्रियता का जीवन हेतु नया आयाम जरूर शुरू करना चाहिए.
         इसी संदर्भ में किसी विद्वान् ने उचित ही कहा है कि अतीत भविष्य की प्रयोग- शाला है. अतीत में हुई अपनी कमियों एवं गलतियों से सबक लेने और भविष्य में उसे न दोहराने का प्लेटफार्म वर्तमान है. इसी बात को लक्षित करते हुए और ही सटीक रूप में ‘खलील जिब्रान’ ने खूब कहा है-‘बीता हुआ कल आज की स्मृति है और आने वाला कल आज का स्वप्न है.’ अतः वर्तमान हमारे पास है. इसलिए इसी समय के एक-एक पल का सदुपयोग परमआनंद के साथ जरूर व्यतीत करना चाहिए. सचमुच जो समय चिंता में गया समझो बिलकुल कूडेदान में गया एवं जो समय चिंतन में गया होता है समझिए अति सुन्दर तिजोरी में जमा हो गया. अतः यह समय अकूत सम्पति, श्रृंगार की बेमिसाल मोती एवं अमृत तुल्य जीवन की संजीवनी घुट्टी है. इसी के द्वारा हम मानव जीवन को खूब ही ऊँचा उठा सकते हैं।
         ‘मार्क ट्वेन’ ने कहा है कि-‘हमें जो सबसे बहुमूल्य वस्तु मिली है, वह समय ही है. अतः इसे किफायती रूप से सोच-सोचकर खर्च करना चाहिए.’ इसी समय की उपयोगिता व प्रगाढ़ता के परम भाव को ध्यान में रखते हुए निम्न पक्तियों को
प्रतिपादित किया था-
                      “कल करे सो आज करे, आज करे सो अब
                        पल में प्रलय होयेगा, बहुरी करोगे कब?”
कबीरदासजी ने निश्चय ही समय की महत्ता को दर्शाया है. ‘कल’ से ‘अब तक के सफर व प्रलय का जिक्र समय के घातक प्रभाव का वर्णन बखूबी किया है. समय की सदुपयोगिता ही जीवन की सार्थकता है क्षण-प्रतिक्षण समय का सदुपयोग जीवन की वास्तविकता का समाया सार है-सार आज के इस क्षण को भविष्य की चिंता में गवाने का अर्थ है-आत्म-ज्ञान विनाश/ चिंताग्रस्त होना या तो चिंता की मुट्ठी में कैद होना एवं आत्म-विनाश का प्रखर मार्ग है. इस विनाश से मुक्ति बहुत जरूरी है, जरूरत है क्षणजीवी बन जाए, अपनी पूरी की पूरी शक्ति, चेतना और क्षमता को इस क्षण में समर्पण कर दें चिंता या भय यों ही काफूर हो जाएंगे, महात्मा गांधी जी ने इससे सम्बन्धित एक महत्ता का कथन कहा है-एक सैनिक यह चिंता कब करता है कि उसके बाद उसके काम का क्या होगा? वह तो अपने वर्तमान समय के कर्तव्यों का ही सिर्फ चिंतन करता है. चिंता के तमाम कारणों का विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि चिंता का कारण मन में बैठा हुआ एक कल्पित ‘भय’ है, जो तनिक भी वास्तविक नहीं है कि ‘अशुभ बातें सोचने की आदत पड़ चुकी है, हम भगोड़े बन चुके हैं, हम कायर हो चुके हैं आदि …… वर्तमान को झेल सकने में असमर्थ व्यक्ति अतीत में आत्म-विस्मृत होना चाहते हैं, वे कायर होते हैं इस बात को लक्ष्य करके डॉ. रांगेय राघव ने साफ लिखा है कि-
                  कायर है वह जो अतीत की छलना में विस्मृत रहता है.
                  वर्तमान की भयद अग्नि में तपकर पीछे को ही मुड़ता है.
 
साफ-साफ बात है कि जो लोग भविष्य की परिकल्पनाओं से प्रेरित होकर वर्तमान से पलायन करते हैं, वे वस्तुत जीवन को जीने के स्थान पर जीवित रहने की मात्र आशा भर ही करते हैं. फलतः ऐसे लोग वर्तमान को कभी भी लक्ष्य नहीं रखते वे जीवन के सच्चे आनन्द से भी जरूर वंचित रह जाते है लोग भूल जाते हैं कि-‘भविष्य को तो वर्तमान द्बारा खरीदा जाता है,’ प्रसिद्ध विचारक ‘शिलट’ ने भी कहा है कि-जो वर्तमान की उपेक्षा करता है, वह अपना सब कुछ खो देता है. हमें पूरी-पूरी तरह जान लेना चाहिए कि भविष्य का निर्माण तो हमारे वर्तमान द्वारा ही किया जा सकता है
      भविष्य के सम्बन्ध में या संदर्भ में अंग्रेजी की एक अच्छी कहावत है– मतलब कि वर्तमान की चिन्ता करे, भविष्य अपनी चिन्ता स्वयं कर लेगा. भविष्य तत्काल ही आने वाला है, वह हमारा दरवाजा खटखटा रहा है. एक प्राच्च (पुराना) देश का बड़ा ज्ञानी हमेशा भगवान से यही प्रार्थना किया करता था कि-हे ! भगवान तुम मुझे ऐसी शक्ति प्रदान करो जिसमें मैं आगामी कल की आँखों द्वारा वर्तमान आज को देख सकूँ हम प्रत्येक कार्य करते समय यह विचार कर लिया करें कि हमारे कल पर, हमारे भविष्य पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा. अतएव भविष्य के स्वस्थ स्वरूप के प्रति पूर्णतः आश्वस्त होने के लिए हमें भी वर्तमान में ही नींव तो रखनी पड़ेगी. ‘सैम्युअल जॉन्सन’ ने बहुत स्पष्ट कहा है कि  हमें वर्तमान में किए अप्रिय कार्यों द्वारा एवं सुखद भविष्य की आशा करना ठीक नहीं है ठीक वैसा ही बेहताशा जैसाकि
बबूल के पेड़ बोकर रसीले आमों की आशा करना होता है, बबूल तो कड़वी फल एवं काँटों से चुभन का ही एहसास कराकर आपको अभिलाषा का पूर्णाहुति प्रदान करेगा, सच्चाई में हमें यथार्थ में ही जीना चाहिए. चिन्ता हमें सावधान करती रहती है व हमारे भीतर की कर्त्तव्य भावना को बार-बार जगाती रहती हैं. हमारी मन की चिन्ताएँ प्रायः वर्तमान
क्षण की नहीं, बल्कि बीते हुए समय की कुछ घटनाओं की या तो भविष्य की छुपी हुई अज्ञात बातों की होती हैं. इन दोनों समय की चिन्ताएँ हमारी भीतरी शक्ति को इस कदर नेस्तानाबूद कर कमजोर बना देती हैं कि हम अपने वर्तमान समय को पूर्ण नष्ट कर, कष्ट के पुरजोर प्रवाह में समाहित हो जाते हैं. जहाँ सिर्फ कष्टों के चोट से कराह रहे होते हैं. अपने अतीत पर दृढता बलपूर्वक फौलादी कपाट भी जरूर जड़ दीजिए वरना अतीत की चिन्ता मन पर बोझ बना रहा तो अवश्य वर्तमान को आसानीपूर्वक गवा बैठेंगे. दूसरी ओर आज और इस समय को अगर हम बीते कल पर खर्च करेंगे तो आज की सुन्दर अति सुन्दर उपलब्धि से अपने आपको जरूर संवार लेंगे.
 
         इसी बीता हुआ कल से सम्बन्धित एक बार भगवान बुद्ध के उपदेश से आग-बबूला एक अतिक्रोधी व्यक्ति जब क्रोध शांत हुआ था तो अपने दुर्व्यवहार का पछताये की आग जलाने लगी तो दूँढते-ढूँढते उसी स्थान पर पहुँचा. बुद्ध तो अन्य गाँव पहुँचे थे, फिर भी जहाँ युद्ध प्रवचन दे रहे थे उनके चरणों में गिरकर क्षमायाचना हेतू गिडगिड़ाने लगा. भगवान बुद्ध ने बड़ा ही शालीन-प्रवीण-प्रेम भावपूर्वक समझाया था-“बीता हुआ कल तो मैं वहीं छोड़कर यहाँ आ गया और तुम अभी भी वहीं अटके हुए हो. चलो, वत्स ! तुम्हें अपनी गलती का आभास हो गया, तुमने पश्चाताप कर लिया अब तुम निर्मल
हो चुके हो. अब तुम आज में प्रवेश करो क्योंकि युरी बातों तथा घटनाओं की याद करने से वर्तमान और भविष्य दोनों के दोनों बिगड़ जाते हैं. बीते हुए कल के कारण आज को कदापि मत बिगाड़ो.”
   जानें उस व्यक्ति का सारा बोझ उतर-सा गया और युद्ध के चरणों में पड़कर क्रोध, त्याग तथा क्षमाशीलता का संकल्प लिया बुद्ध ने उसके मस्तिष्क पर आशीष का हाथ रखा पुनः उसमें धारदार परिवर्तन समा आया, तदोपरांत उसके जीवन में सत्य प्रेम, करुणा, अतीत का निर्भयता आदि गुणों की नई जोशीली धारा बहने लगी थी. इस तरह बीती बातों को कोसना छोड नये संकल्प के नये मोड़ लेते हुए वर्तमान को जरूर ही सुदृढ़ करना चाहिए. सच्ची बात है.
       किसी विचारक ने ठीक ही कहा था- ‘पहले मैंने समय को नष्ट किया, अब समय ही मुझे नष्ट कर रहा है.’ इनका मतलब साफ है कि समय ही जीवन है. अक्षरशः सत्य बात है कि बीते समय को किसी सूरत में वापस नहीं लाया जा सकता है. इसीलिए मानव/इन्सान को जरूर चिन्तन कर इस समय का एक-एक क्षण का सदुपयोग करें समय तो अपनी गति से चलता ही चलता रहता है. यह न तो किसी की प्रतीक्षा करता है और ना ही किसी के लिए अपनी चाल को अधिक बढाता है एवं ना ही तो धीमी करता और ना ही तो कदापि रुक पाता है. “थॉमस अल्या एडीसन” को समय के उपयोग करने की अच्छी आदत ने ही एक महान वैज्ञानिक बनाया. इन्होंने अपने जीवन में कई-कई छोटे-बड़े सारे मिलाकर तकरीबन 2500 आविष्कार किए. स्पष्ट में समय ही भगवान है. इसीलिए समय को काल भी कहा गया है. समय के ही गर्भ में सब कुछ समाहित होता है. इस समय को खूब अच्छी तरह समझने-बुझने वाले इन्सान जीवन में इतिहास रचते हैं व अमिट छाप इस जहाँ में छोड़ जाते हैं. अतः समय (वक्त) के सदुप- योग कर चलते रहना है ना कि गुजरे समय में मरना है. इसीलिए कहा गया है-वक्त (समय) है, वक्त की रफ्तार है, जो नहीं चल रहा वह समझो गुनहगार है. वक्त को काटने वालों खुद ही कट जाओगे, वक्त तो एक दोधारी तलवार है.”

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