भाषा की उत्पत्ति: विविध मत

भाषा की उत्पत्ति: विविध मत

                            भाषा की उत्पत्ति: विविध मत

भारत के अलावा यूनान, मिश्र, अरब तथा अन्य देशों की धार्मिक एवं भाषा विषयक पुस्तकों में भाषा की
उत्पत्ति के संबंध में संकेत से बहुत बातें मिल जाती हैं। कुछ तो इन प्रत्ययों के आधार पर और कुछ स्वयं विश्लेषण
कर विद्वानों ने जो सिद्धांत खड़े किये हैं उनकी एक रूपरेखा यों तैयार की जा सकती है :
 
1. दैवी-उत्पत्ति सिद्धांत या मत-भाषा की उत्पत्ति के विषय में यह मत सर्वाधिक प्राचीन है। इस सिद्धांत
के आधार पर यह माना जाता है कि अन्य अनेक चीजों की ही तरह भाषा भी ईश्वरकृत है और इसे भी ईश्वर ने 
ही बनाया है। भारतीय पंडित इसी मत के तहत वैदिक ग्रंथों को अपौरुषेय मानते हैं। वे यह मानते हैं कि संस्कृत
वस्तुत: देवभाषा है, जिसे ईश्वर ने खुद बनाया है। महान वैयाकरण महर्षि पाणिनि के चौदह सूत्रों को शिव के डमरू
से ही निष्पन्न माना जाता है । ध्यातव्य है कि यही संस्कृत भाषा और व्याकरण का मूलाधार है। मैक्समूलर (प्रसिद्ध
जर्मन भाषाविद्) प्राणिनि के व्याकरण को दुनिया की सभी भाषाओं के व्याकरण का मूलाधार मानते हैं। इतना ही
नहीं, बौद्ध पालि भाषा को आदि (मूल) भाषा मानते हुए उसे अनादि कालीन तक कहते हैं । जैनियों की भी अपनी
मान्यता है। वे तो और भी आगे बढ़कर अर्द्धभागधी को केवल मनुष्यों की ही मूल भाषा न मानकर उसे सभी जीवों
की मूल भाषा मानते हैं। उनका कहना है कि महावीर स्वामी जब उपदेश देते थे तो क्या देवलोक के वासी, क्या
पशु-पक्षी-सभी उन उपदेशों को आत्मसात करते थे।
 
बाइबिल के अनुसार भाषा की उत्पत्ति का सीधा ताल्लुक आदम के साथ जुड़ा हुआ है। भाषा वस्तुतः आदिम
मानव आदम के साथ ही उद्भूत हुई है। आदम ईश्वर की भाषा को समझते थे और उन्होंने मैदानों के पशुओं और
हवा में उड़ने वाले परिंदों को भी नाम दिया था। प्रत्येक जीवधारियों को उन्होंने जिन-जिन नामों से पुकारा था, वे
ही नाम उन जीवों के नाम-संज्ञा रूप हो गये।
 
कैथॉलिक ईसाई हिब्रू भाषा के धर्मग्रंथ ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ को संसार की समस्त भाषाओं की जननी भाषा मानते
हैं। उनका मानना है कि हिब्रू आदम और हव्वा को पूर्ण विकसित भाषा के रूप में भगवान द्वारा ही प्रदत्त की गयी
थी। बहुत बाद में उस भाषा के ही अनेक रूप हो गये और इस तरह पूरे संसार में अनेक भाषाएँ हो गयीं।
 
कुरान की एक आयत के अनुसार भी “उसने आदम को नाम सिखाए, सारे के सारे नाम”-(मेरियो पी: द
स्टोरी ऑफ लैंग्वेज : जार्ज एलेन एंड अनविन, लंदन : 1965, पृ० 21) आज भी सारे मुसलमान कुरान को खुदा का
ही कलाम मानते हैं।
 
मिश्र देश के वासी. अपनी ही मिश्री भाषा को देवताओं की सृष्टि मानते रहे हैं, ठीक वैसे ही जैसे भारतीय
संस्कृत को ‘देवभाषा’ ‘देववाणी’ या ‘ब्रह्मवाणी’ तक मानते रहे हैं।
 
प्लेटो ने सभी चीजों के नामों को प्राकृतिक या प्रकृति प्रदत्त कहा था। सच तो यह है कि ब्याज से यह मत
भी दैवी उत्पत्ति के सिद्धांत का ही निरूपक है। वे भी मानते थे कि लोग जन्म भाषा सीखकर आते हैं। सत्रहवीं
शताब्दी तक स्वीडेन के एक भाषाशास्त्री का यह निश्चित मत था कि ईडन के बाग में ईश्वर, आदम और साँप क्रमशः
स्विस, डेनिश और फ्रेंच भाषा में बातें करते थे।
 
सन् 1934 में तुर्की भाषा के एक सम्मेलन में पूरी गंभीरता के साथ यह दावा किया गया था कि समस्त
भाषाओं की जननी तुर्की भाषा ही है और सभी शब्दों का मूल तुर्की भाषा का सूर्यवाची शब्द है। यही ऐसी सत्ता
थी जिसकी ओर मनुष्य का ध्यान सर्वप्रथम गया और उसे अभिहित करने की आवश्यकता उसे पड़ी। त्राम्बेती नामक
एक इतालवी भाषा वैज्ञानिक ने तो बीसवीं शताब्दी में भी यह मानने का दृढ़ साहस किया कि बैबेल की मीनार की
कथा यदि वस्तुतः सत्य न भी हो तो भी व्याज रूप से यह सच अवश्य है।
 
वास्तव में ईश्वर ने सर्वप्रथम किस भाषा की सृष्टि की यह भी जिज्ञासा का विषय बना रहा है । इस तथ्य
का पता लगाने के लिये भी प्राचीन काल से ही कुछ-न-कुछ प्रयोग होते रहे हैं । मिश्र के राजा साम्मेतिकस ने कुछ
बच्चों को बहुत छोटी अवस्था में ही नितांत एकांत में रखा जिनकी परिचर्चा में लगे रहने वालों को अपने मुँह से
आवाज न निकालने की हिदायत दी गयी थी। ऐसा ही एक प्रयोग सिसिली के फ्रेडरिक द्वितीय ने सन् बारह सौ के
आसपास किया था। इस तरह का अंतिम प्रयोग स्काटलैंड के राजा जिम्स चतुर्थ ने सन् पन्द्रह सौ के लगभग किया
था। इन तीनों प्रयोगों के परिणाम निराशाजनक होने के सिवा और क्या हो सकते थे ? “मानवीय वाणी से अछूते ये
बच्चे गूंगे होने को या मृत्यु का ग्रास बनने को ही बाध्य थे”-(बी० एफ० स्किनर : बर्बल बिहेवियर : एपलटन :
सेंचुरी क्राफ्ट्स : 1957, 
 
कतिपय धर्मांध लोगों के अतिरिक्त आज इस सिद्धांत को शायद ही कोई मानता हो। इसके बावजूद अति
प्राचीन काल से चले आ रहे इस विश्वास का कुछ मूल्य तो है ही। परंतु यह धारणा कई कारणों से आधारहीन लगती
है। यह दैवी उत्पत्ति का सिद्धांत तर्कहीन लगता है। इस संबंध में कभी बादशाह अकबर ने भी एक प्रयोग किया
था जिसके आधार पर यह सिद्ध हुआ कि बच्चा पेट से ही कोई भाषा सीख कर नहीं आता; अर्थात् ईश्वर प्रदत्त
कोई भाषा नहीं होती। ऐसा मानना कि वह ईश्वर प्रदत्त है, कोरा अंधविश्वास है। इस संबंध में पहली बात तो यह
है कि यदि भाषा ईश्वर प्रदत्त है तो दुनिया की विभिन्न भाषाओं में इतना विभेद क्यों है ? पूरे संसार में गदहे, भैंसे,
कुत्ते आदि जीव लगभग एक से ही बोलते हैं। किंतु मनुष्यों की भाषा में वह एकरूपता क्यों नहीं है ? दूसरी बात
 
यह है कि यदि भाषा ईश्वर प्रदत्त होती तो कदाचित आरंभ से ही वह विकसित होती, किंतु इतिहास में ठीक उलटा
ही प्रमाण मिलता है।
 
अस्तु निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि भाषा का आरंभ इतने प्राचीन काल में हुआ कि उस क्क मनुष्य
को जातीय स्मृति की भी पहुँच नहीं है और इसलिये भाषा की उत्पत्ति के विषय में अति प्राचीन काल में भी जो इतर
व्याख्याएँ दी गयी हैं उनका जो भी मूल्य हो सकता है वह उनकी संगति के आधार पर ही । प्राचीनता का कोई लाभ
उन्हें नहीं दिया जा सकता।
 
2. शैशव कालीन बर्राहट का सिद्धांत-मानव-शिशु अपनी भाषा के प्राथमिक शब्दों से परिचित होने से
काफी पहले ही कुछ ध्वनियों को स्वान्तः सुखाय बर्राता रहता है, यथा ‘पपपप’, ‘मममम’ आदि । अपने विकास की
प्राथमिक अवस्था में मनुष्य भाषा के मामले में एक शिशु जैसा ही था और इसी प्रकार बर्राने के क्रम में भाषा का
आविष्कार भी उसने किया होगा।
 
इस सिद्धांत की व्यर्थता पूर्व उल्लिखित प्रयोगों से तो सिद्ध होती ही है, साथ ही भेडियों, कुत्तों और बंदरों द्वारा
शैशवावस्था में ही अपहृत बालकों की बोलियाँ भी इसका निषेध करती हैं। वे मनुष्य की तरह न बोलकर उन पशुओं
की बोली बोलते हैं जिनके बीच वे पले और बढ़े हैं। इसके अतिरिक्त “बधिर बच्चे जो अपनी जन्मजात बधिरता के
कारण ही गूंगे होते हैं और अपनी शैशवावस्था में भी रोते-चिल्लाते तो हैं पर श्रुतिदोष से मुक्त बालकों की तरह बर्राते
नहीं हैं।”-(नार्मन एल० मन : इंड्रोडक्शन टू साइकालोजी”, पृ० 440) इस तरह यह मान्य लगता है कि अपनी
शैशवावस्था में भी बालक अपने आस-पास की ध्वनियों को सुनकर ही बुदबुदाना प्रारंभ करता है और सार्थक
उच्चारण से पूर्व की अवस्था में वह बोलने की दिशा में ही एकांत प्रयोग कर रहा होता है । यह भी सच है कि अपनी
बुदबुदाहट से उसे आनंद मिलता है और वह उन्हीं ध्वनियाँ की आवृति आत्म-संगीत की तरह करता है। इतनी-सी
सार्थकता ही है। बड़ी बात यह है कि मनुष्य अपने विकास की आदिम अवस्था में भी शिशुवत नहीं था। यह उसकी
आदिमता की अतिरंजना मात्र है।
 
यह कहना है कि शिशु अपने प्रारंभिक उच्चारणों में पप, मम आदि कहता है इस समस्या का सरलीकरण है।
शिशु प्रकृत भाव से अपने हाथ-पाँव झटकता है, पेशियों को तानता और ढीला करता है, नथनों, भौंहों आदि को
सिकोड़ता है और ओठों व जबान को मसूढ़ों से चबाता है। इन क्रियाओं में उसकी अतिरिक्त ऊर्जा को निष्कृति मिलती
है। अत: शिशु को इनमें अधिक आनंद मिलता है। यही कारण है कि केवल स्वस्थ शिशुओं में ही ये क्रियाएँ पाई जाती हैं।
 
उक्त क्रियाओं से ही मिलती जुलती एक क्रिया है, होठों को बार-बार उठाना-गिराना और इस क्रम में जिह्वा
के भी अनेक प्रकार के चालन । इनसे स्वभावतः ही कुछ ध्वनियाँ निकलती हैं। ये ध्वनियाँ प प, म म , च च, त,
क, क, ग, ग, व, ब, द, द आदि कुछ भी मानी जा सकती हैं और उनकी अनुकृति पर रिश्तों के बहुत से नाम ऐसी
भाषाओं में देखने में आते हैं, जिनकी प्रकृति अनुकारी स्रोतों के अधिक निकट है। द्रविड शब्द अम्मा, अत्तता, अप्पा,
अक्का, अच्चन, मामो, भामि, अन्ना, अण्णा और आर्य बोलियों में अम्मा, तात, मात, बाबा, दादा, दादी, दीदी, आजा,
 
काका, चाचा, बीबी, बूबू, बाबू, मामा, मामी, नाना आदि पर दृष्टिपात किया जा सकता है। पर इन शब्दों को
शैशवकालीन-बर्राहट से निष्पन्न होते हुए भी अनुकारी आधार पर विकसित मानना अधिक समीचीन लगता है।
 
3. सांकेतिक उत्पत्ति का सिद्धांत-इस सिद्धांत के अनुसार यद्यपि भाषा को मनुष्य-सृष्टि के साथ ईश्वर :
नहीं रचा है तो भी उसे आदिकालीन मानव-समाज ने बना लिया था। जब मानव जंगली और असभ्य था तर
अंग-संचालन के संकेतों द्वारा ही अपने वैचारिक विनिमय कर लेता था। परंतु जब अंग संचालन के संकेतों द्वारा उसक
कार्य यथेष्ट रूप में नहीं चल सका, तब समुदाय ने एकत्र होकर अपने विचारों के लिये भिन्न-भिन्न शब्दों का निर्माण
कल्पना द्वारा अपने व्यवहार के लिये कर लिया। आज की भाषा उन्हीं ध्वनि-संकेतों का विकसित रूप है। इसे ही
‘इंगित सिद्धांत’ नाम दिया गया।
 
इस सिद्धांत के प्रणेताओं ने भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त हिब्रू, पुरानी चीनी, तुर्की तथा कुछ अन्य भाषाओं
के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला था। ये विकास की चार सीढ़ियाँ मानते हैं-पहली सीढ़ी भावव्यंजक ध्वनियों की
है, जब मनुष्य भय, दुःख, क्रोध, हर्ष, भूख, प्यास, मैथुनेच्छा आदि के कारण बंदरों आदि की तरह इस प्रकार की
ध्वनियों द्वारा अपने भावों को व्यक्त करता है। दूसरी सीढ़ी अनुकरणात्मक शब्दों की है, जब विभिन्न जीव-जंतुओं
तथा निर्जीव पदार्थों की ध्वनियों के अनुकरण पर शब्द बने होंगे। तीसरी सीढ़ी भाव-संकेत या इंगितों की है। इनका
भी आधार अनुकरण है। जीभ, हाथ या अन्य अंगों के संकेत । यह बिना जाने किया हुआ अनुकरण है। हालाँकि
इस तीसरी सीढ़ी में केवल स्थूल के लिये ही शब्द बने होंगे।
 
सूक्ष्म भावों के लिये बनने वाले शब्दों की चौथी सीढ़ी है। इस प्रसंग में उन्होंने स्वर, व्यंजन आदि के विकास
की ओर भी संकेत किया है। वे ध्वनियों से अर्थ का संबंध भी स्थापित करते हैं, जैसे ‘र’ से आरंभ होने वाली
वस्तुओं या धातुओं का अर्थ ‘गति’ तथा ‘म’ से आरंभ होने वाली धातुओं का अर्थ बंद करना, चुप करना तथा समाप्त
करना आदि, क्योंकि इनके उच्चारण में होंठ लगभग यही क्रिया करते हैं। उनका मानना है कि अनुकरणों पर एक
सौ छियानवे मूल भावों के द्योतक शब्दों का निर्माण आरंभ में हुआ था।
 
इस मत में भाषा के आरंभ और विकास की दृष्टि से मान्य तर्क हैं, किंतु इसके बाद जीभ आदि अंगों से हाथ
आदि बाह्य अंगों के अनुकरण के आधार पर ध्वनि या शब्दों की उत्पत्ति की धारणा समझ में आती है।
 
दूसरे इस प्रसंग में ध्वनि और अर्थ का जो तर्कसंगत संबंध स्थापित करने की कोशिश की गयी है, वह भी
असंतोषजन्य है। पुरानी भाषाओं के शब्द-समूह पर दृष्टि दौड़ाने से यह बात पूर्णतः प्रमाणित होती है। प्रश्न है धातु
या शब्द का क्या केवल प्रथम वर्ण ही महत्त्वपूर्ण है ? और यदि है भी तो बाद के वर्ण किस आधार पर रखे गये?
तर्क-बुद्धि और भाषा का विकास साथ-साथ हुआ है। इसके प्रतिपादक ने शब्दों के बनने में सामान्य सिद्धांत की बात
उठाई है। यदि उसे उतना यांत्रिक माना जाय तो संसार की प्रायः सभी प्राचीन भाषाओं में प्रारंभिक भावों को वक्त
करने वाले समानार्थी शब्दों में पर्याप्त साम्य होना चाहिये था पर वैसा नहीं है।
 
4. धातु सिद्धांत-‘हेज’ के मत के आधार पर मैक्समूलर ने भाषा की उत्पत्ति के विषय में इस अनोखे मत
का प्रतिपादन किया था। मैक्समूलर कहते हैं-“प्रायः सारी प्रकृति में यह नियम पाया जाता है कि हर वस्तु टकराने
पर ध्वनि या शब्द उत्पन्न करती है। यह शब्द या झंकार प्रत्येक पदार्थ के संदर्भ में एक विशेष प्रकार की होती है।
धातुओं के स्वरूप को हम उनकी आवाज या कंपन से पहचान लेते हैं। ताँबा, पीतल, टीन और लोहे की झंकार और
कंपन की आवाज एक निश्चित प्रकार की है। मनुष्य के संदर्भ में भी यही बात पायी जाती है। सृष्टि के आरंभ में
एक ऐसी ‘विभाषिक’ शक्ति मनुष्य में थी। किसी वस्तु को देखते ही स्वयमेव उसके मुख से एक प्रकार की ध्वनि
प्रकट हो जाती थी। यह एक नैसर्गिक शक्ति थी, जो भाषा के विकसित होने पर नष्ट हो गयी।” स्पष्ट है मैक्समूलर
की दृष्टि में भाषा का प्रासाद उन्हीं के मुख से निकली हुई ध्वनियों के आधार पर खड़ा हुआ ।
 
वास्तव में यह मत इस आधार पर स्थापित है कि भाषा और विचार का नित्य संबंध है। विचार के बिना
वर्णनात्मक शब्दों की रचना नहीं हो सकती। मनुष्य जब बोलता है तो यह जाहिर करता है कि वह ऊँचे स्वर में सोच
रहा है। जब वह सोचता है तो मानना चाहिये कि वह धीरे-धीरे बोल भी रहा है।
 
इसी मत को बाद में ‘डिंग-डाँगवाद’ या ‘अनुरणन सिद्धांत’ भी कहा जाने लगा। हर चीज की स्वाभाविक
और प्राकृतिक ध्वनि आहत होने पर ध्वनि करती ही है। विभिन्न वस्तुओं की ये ध्वन्यात्मक अभिव्यक्तियाँ धातु’
थीं। शुरू में इसलिये धातुओं की संख्या बहुत थीं। बाद में धीरे-धीरे वे लुप्त होती गयीं और शेष मात्र चार-पाँच
सौ धातुएँ बची रहीं। उन्हीं से भाषा की उत्पत्ति हुई। कुछ दार्शनिकों ने बाद में इसे ‘नेटिविस्टिक’ सिद्धांत की संज्ञा
दी थी। इस सिद्धांत के विरूद्ध कई बातें थीं:
 
1. आदि मानव के लिये इस प्रकार की कल्पना का कोई तर्कसंगत आधार आज तक नहीं प्राप्त है।
 
2. संसार की सभी भाषाओं में धातुओं का अस्तित्व नहीं है, कुछ भाषाओं में तो धातु नाम की कोई चीज ही नहीं है।
 
3. यदि केवल धातुओं से ही भाषा बनती तो प्रत्यय, उपसर्ग आदि अन्य रूपों की उत्पति के विषय में क्या कहेंगे?
 
4. सच तो यह है कि भाषा के अध्ययन-विश्लेषण के आधार पर धातुओं का पता भाषा की उत्पत्ति के कई
हजार वर्षों बाद लगाया गया और धातु में प्रत्यय-उपसर्ग जोड़कर शब्द बनाने का ढंग उसके बाद अपनाया गया। इस
तरह यह मत भी तर्क से पर ठहरता है।
 
5. मनोभावाभिव्यंजकतावाद-भाषा विज्ञान में इस सिद्धांत के अनेक नामों से जाना जाता है जैसे-पूंह-पूहवाद,
‘आवेग सिद्धांत’ मनोरागव्यंजक शब्द मूलकतावाद, मनोभावाभिव्यक्तिवाद आदि । मैक्समूलर इसे मजाक में पुह-पुहवाद
कहते थे। इस सिद्धांत के अनुसार कतई प्रारंभ में मानव विचारप्रधान प्राणी न होकर पशुओं की ही भाँति भावप्रधान
था और दुख, विस्मय, प्रसन्नता, तथा घृणा जैसे भावों को व्यक्त करने के आवेग में उसके मुँह से, छि:, ओह, धिक,
आह, फाई, पुह, पिथ, जैसे शब्द सहज ही निकल जाया करते थे। विकासवाद के जनक डार्विन इन ध्वनियों का
कारण शारीरिक मानते हैं। धीरे-धीरे इन्हीं शब्दों से भाषा का विकास मानने वाला यह सिद्धांत भाषा का मुख्य उद्देश्य
भावों को अभिव्यक्त करना मानता है। इस सिद्धांत की भी कमियाँ हैं:
 
(i) पहली बात यह है कि भिन्न-भिन्न भाषाओं में ऐसे शब्द एक ही रूप में नहीं मिलते । यदि स्वाभाविक
रूप से निस्स्त होते तो ये सभी मनुष्यों में लगभग एक से होने चाहिये थे । संसार भर के कुत्ते दुखी होने पर लगभग
एक ही प्रकार से मूंक कर रोते हैं परंतु ऐसा संसार भर के मनुष्य दुखी होने पर एक प्रकार से ‘हाय’ नहीं करते न
ही प्रसन्न होने पर एक ही प्रकार से ‘वाह’ या अन्य भाव व्यक्त करते हैं। सच तो यह है कि ये ध्वनियाँ पूर्णतया
यादृच्छिक हैं और इनके साथ संयोग से संबद्ध हो गये हैं।
 
(ii) दूसरी बात यह है कि इन शब्दों से पूरी भाषा पर प्रकाश नहीं पड़ता । किसी भी भाषा में ऐसे शब्दों के
संख्या चालीस या पचास से अधिक नहीं होती। बेनफी नामक भाषाविद् ने ठीक ही कहा है कि ऐसे शब्द केवल
वहाँ प्रयुक्त होते हैं, जहाँ बोलना संभव नहीं होता।
 
(iii) तीसरी बात-यदि इन्हें भाषा का अंग मान भी लिया जाय तो अधिक से अधिक इतना कहा जा सकता
है कि कुछ थोड़े से शब्दों की उत्पत्ति की समस्या पर ही इससे प्रकाश पड़ता है। इसमें यह भी स्पष्ट नहीं है कि
और शब्द, जो भाषा के अपेक्षाकृत अधिक प्रमुख अंग हैं, इनसे किस प्रकार विकसित हुए होंगे। हाँ, इतना अवश्य
स्वीकार किया जा सकता है कि इस प्रकार की ध्वनियाँ आरंभ में अधिक रही होंगी और उनका प्रयोग भी भाषा के
अभाव में अधिक होता रहा होगा। इसीलिये इसके कारण धीरे-धीरे विभिन्न प्रकार की ध्वनियों के उच्चारण का
अभ्यास बढ़ा होगा, जिससे भाषा के विकसित होने में कुछ सहायता मिली होगी। जाहिर है भाषा की उत्पत्ति की
समस्या का समाधान इस सिद्धांत से नहीं होता।
 
6. श्रम-परिहार का सिद्धांत-इसे ही श्रम-परिहरण मूलकतावाद, यो-हे-हे होवाद, श्रम-ध्वनि सिद्धांत आदि
नामों से भी जाना जाता है। इसके जन्म दाता ‘न्वायर’ नामक विद्वान थे। उनका यह सिद्धांत था कि परिश्रम का
कार्य करते समय साँस तेजी से बाहर-भीतर, आने-जाने, साथ-साथ स्वर तंत्रियों के विभिन्न रूपों में कॉपित होने एवं
तदनुकूल ध्वनियाँ उच्चरित होने से कार्य करनेवाले को राहत मिलती है। बोझ उठाने वाले मजदूर और कपड़े धोने
वाले धोबी आदि काम करते समय अपने मुँह से कुछ ध्वनियाँ शब्द अथवा पद निकालते हैं। इनके पीछे एक ही
प्रयोजन होता है श्रम का परिहार, क्योंकि जब मनुष्य शारीरिक श्रम करता है तो उसके श्वास-प्रश्वास का वेग बढ़
जाता है, जो स्वाभाविक भी हैं। इससे उन्हें विश्राम भी मिलता है। धोबी ‘हियों’ या ‘छियो’ कहता है। मल्लाह
थकान मिटाने के लिये यो हे-हे कहता है । क्रेन पर कार्य करने वाला मजदूर भी काम करते समय हो-हो या कुछ
इसी प्रकार की ध्वनियाँ करता है । इसी प्रकार सड़क कूटने वाला श्रमिक जब-जब दुर्मुस उठाता है तो है या हूँ आदि
उच्चारण करता है। इस प्रकार की शब्द-ध्वनियाँ हो भाषा का आदि रूप आज भी बनी हुई है। ऐसा प्रतीत होता
है कि भाषा का विकास मानवीय कार्य-कलाप के दौरान ही हुआ है, अत: संभव है इसी प्रकार की ध्वनियों ने क्रमशः
भाषा की सर्जनी की हो। परंतु इस सिद्धांत में इस एक बात को छोड़कर भाषा का विकास मानवीय क्रिया-कलाप
के विकास-श्रम में हुआ है। शेष स्थापना एकांगी और पूर्णत: निराधार प्रतीत होती है।
 
मनुष्य श्रम-परिहार के लिये या तो कतिपय विस्मयादि बोधक चिन्हों का प्रयोग करता है या अपनी भाषा के
ही शब्दों या पदों को दुहराता है जैसे-जोर लगाओ हइसा-कोई नई सर्जना नहीं करता । वैसे भी इन शब्दों या ध्वनियाँ
का भाषा में कोई स्थान नहीं है और न तो इन ध्वनियों से किसी विशिष्ट अर्थ का ही संबंध है।
 
7. टा-टा सिद्धांत-इस सिद्धांत के आरंभ में आदिम मानव काम करते समय जाने-अनजाने उच्चारण अवयवों
से काम करने वाले अवयवों की गति का अनुकरण करता था और इस अनुकरण में कुछ ध्वनियों तथा ध्वनि-संयोगों
से शब्दों का उच्चारण हो जाया करता था। इन्हीं ध्वनियों और शब्दों से धीरे-धीरे भाषा का विकास हुआ होगा।
कहना न होगा कि अनुकरण वाली यह बात बहुत कुछ एक और सिद्धांत इंगित सिद्धांत (जिसकी चर्चा बाद में की
जायगी।) से मिलती-जुलती है। जाहिर है ऐसा अनुकरण न तो आज का सभ्य मनुष्य करता है और न असभ्य या
अविकसित मनुष्य । मनुष्यों के तथाकथित जनक में भी सबमें यह प्रवृत्ति नहीं मिलती। इस प्रश्न को यदि छोड़ भी
दें तो उन आरंभिक निरर्थक ध्वनियों से भाषा का विकास कैसे हुआ, इस बात का इस सिद्धांत में कोई दो-टूक उत्तर
नहीं दिया गया है। स्पष्ट है इसी कारण यह सिद्धांत भी बहुत मान्य नहीं हुआ।
 
8. संगीत का सिद्धांत-इस सिद्धांत के अनुसार भाषा की उत्पत्ति मानवीय संगीत से हुई थी। डार्विन, स्पेंसर
जैसे लोगों ने इसे कुछ रूपों में माना था। यसपर्सन ने भी जहाँ वे कहते हैं कि भाषा की उत्पत्ति खेल के रूप में
हुई थी और उच्चारण-अवयव खाली वक्त में गाने के खेल के उच्चारण करने में अभ्यस्त हुए-इसका समर्थन किया।
उसके अनुसार गाने (प्रेम, दुख आदि के अवसर पर) से प्रारंभिक अर्थविहीन अक्षर बने और विशेष स्थिति में उनका
प्रयोग होने से उन अक्षरों से अर्थ का संबंध हो गया।
 
आदिम मानव संभवतः भावुक अधिक रहा होगा । जाहिर है इसलिये गुनगुनाने में उसे आनंद आता होगा। किंतु
गुनगुनाने के अक्षरों से भाषा कैसे बनी होगी, इसका स्पष्ट उत्तर इसके समर्थकों ने हमारे सामने नहीं रखा है। इसके
साथ ही गुनगुनाने की बात भी तो अनुमान के अधिकार पर ही कही जाती है। ऐसी स्थिति में इस सिद्धांत को स्वीकार
करना भी संभव नहीं है।
 
इस संगीत का संबंध अपेक्षया प्रेम से अधिक है। इसी कारण कुछ लोगों ने इसे प्रेम सिद्धांत कहकर भी पुकारा
है। प्रो० हडसन के अनुसार सादृश्य के आधार पर ही यह नाम दिया गया होगा।
 
9. इंगित सिद्धांत-इस सिद्धांत की ओर सबसे पहले संकेत करने का श्रेय पॉलिनेशियन विद्वान (भाषाविद्)
डाक्टर राये को है। कुछ दिन बाद डार्विन ने भी छह असंबंद्ध भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर इसे
प्रमाणित किया था। पिछली सदी में सन् 1930 के आसपास रिचर्ड ने इस सिद्धांत को पुनः उठाया था और अपनी
पुस्तक ह्यूमेन स्पीच में मौखिक ‘इंगित सिद्धांत’ नाम से इसे विद्वानों के समक्ष रखा। आइसलैंड के भाषाविद्
जोहानसन भी इसी समय भारोपीय भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन कर लगभग इसी निष्कर्ष पर पहुँचे। बाद में
उन्होंने इसे भारोपीय भाषाओं के अतिरिक्त हिब्रू, पुरानी चीनी, तुर्की तथा कुछ अन्य भाषाओं पर आधारित किया।
ये भाषा के विकास की चार सीढ़ियाँ मानते हैं। पहली सीढ़ी भावव्यंजक ध्वनियों की है जब, मनुष्य भय, दुख, क्रोध,
भूख, प्यास, मैथुनेच्छा आदि के कारण बंदरों आदि की तरह इस प्रकार की ध्वनियों द्वारा अपने भावों को व्यक्त करता
है। दूसरी सीढ़ी अनुकरणात्मक शब्दों की है। इस अवस्था में विभिन्न जीव-जंतुओं के निर्जीव पदार्थों की ध्वनियों
के अनुकरण पर शब्द बने होंगे। तीसरी सीढ़ी भाव-संकेत या इंगितों की है। इनका भी आधार अनुकरण है पर यह
अनुकरण (जीभ आदि द्वारा) बाहरी चीजों का न होकर अपने अंगों का (प्रमुखतः हाथ का) या अंगों के संकेतों
का है। इसे जोहानसन ने बिना जाने किया हुआ अनुकरण कहा है । भाषा के विकास में वे इसी को महत्त्वपूर्ण मानते
हैं। परंतु, इस तीसरी स्थिति में केवल स्थूल के लिये शब्द बने होंगे । मानव के मानसिक विकास के और आगे बढ़ने
पर धीरे-धीरे सूक्ष्म भावों आदि के लिये भी शब्द बने होंगे। यह चौथी अवस्था थी। इस प्रसंग में उन्होंने स्वर, व्यंजन
आदि के विकास की ओर भी संकेत किया है। ध्वनियों से अर्थ का संबंध भी ये स्थापित करते हैं, जैसे ‘र’ से आरंभ
होने वाली धातुओं का अर्थ गति (क्योंकि जीभ इसके उच्चारण में दौड़ती है) तथा ‘म’ से आरंभ होने वाली धातुओं
का अर्थ बंद करना चुप होना) तथा समाप्त करना आदि, क्योंकि इसके उच्चारण में होंठ लगभग यही क्रिया करते
हैं । वे यह भी कहते हैं कि आदि मानव ने अपने शरीर में तरह-तरह के झुकाव तथा टेढ़ापन (कर्व) देखें और उनके
अनुकरण पर इसने एक सौ छियानवे मूल भावों के द्योतक शब्दों का आरंभ में निर्माण किया ।
 
इस मत में भाषा के विकास की आरंभिक स्थितियाँ तो निश्चित रूप से आरंभ और विकास की दृष्टि से मान्य
हो सकती हैं किंतु इसके बाद जीभ आदि अंगों से हाथ आदि बाह्य अंगों के अनुकरण के आधार पर ध्वनि या शब्दों
की उत्पत्ति गले के नीचे नहीं उतरती । दूसरे, इस प्रसंग में ध्वनि और अर्थ का ‘तर्क सम्मत’ संबंध स्थापित करने की
जोहानसन ने जो कोशिश की है वह तो और भी असंतोषजनक प्रमाणित होती है। इसके आधार पर कुछ भाषाओं
के कुछ शब्दों में उनकी बातें मिल भी जाएँ, यह दूसरी बात है परंतु पुरानी भाषाओं के प्राचीनतम शब्द-समूह पर दृष्टि
दौड़ाने पर भी यह बात पूर्णत: सही नहीं उतरती । उदाहरणत: ‘र’ से आरंभ होने वाली धातुओं का अर्थ वे गति मानते
हैं। उदाहरण के रूप में वे हिब्रू धातु vbk (मिलाना), rbk (चढ़ना) आदि देते हैं, किंतु संस्कृत और ग्रीक आदि
में अन्य ध्वनियाँ से आरंभ होने वाले गत्यर्थक धातुओं की भी कमी नहीं है। इस सिद्धांत को और सूक्ष्मता से देखने
पर यह भी कहा जा सकता है कि धातु या शब्द का क्या केवल प्रथम वर्ण ही महत्त्वपूर्ण है और यदि हैं भी तो
बाद के वर्ण किस आधार पर रखे गये ? प्रश्न है क्या उस काल में मानव में इतनी तर्कणाबुद्धि आ गयी थी? शायद
नहीं। तर्कबुद्धि और भाषा-विकास तो साथ-साथ हुआ है। इसके प्रतिपादक ने भाषा के बनने में सामान्य सिद्धांतों
की बात उठाई है। यदि उसे इतना यांत्रिक माना जाय तो संसार की प्रायः सभी प्राचीन भाषाओं में प्रारंभिक भावों
को व्यक्त करने वाले समानार्थी शब्दों में पर्याप्त साम्य होना चाहिये किंतु यह बात भी नहीं ही है। इस सिद्धांत के
विरूद्ध इसी प्रकार की और भी आपत्तियाँ उठाई जाती हैं। परिणामतः इसके आरंभिक अंश को छोड़कर शेष को
स्वीकार्य नहीं माना जा सकता।
 
10. अनुकरण सिद्धांत-यह सिद्धांत भाषा की उत्पत्ति को अनुकरण सिद्धांत का परिणाम मानते हैं। मनुष्य
ने अपने आस-पास के जीवों और चीजों आदि की आवाज के अनुकरण पर प्रारंभ में शब्द बनाए और उसी पर भाषा
का महल खड़ा हुआ। इस सिद्धांत के अंतर्गत तीन उपसिद्धांत रखे जा सकते हैं: (क) ध्वन्यात्मक अनुकरण,
(ख) अनुरणनात्मक अनुकरण, एवं (ग) दृश्यात्मक अनुकरण ।
 
(क) ध्वन्यात्मक अनुकरण-इसके अन्य नाम अनुकरण सिद्धांत, भों-भों वाद, शब्दानुकरणवाद तथा
शब्दानुकरण मूलकतावाद भी हैं । इसके अनुसार मनुष्य ने अपने आसपास के पशु-पक्षियों आदि से होने वाली ध्वनियों
के अनुकरण पर अपने लिये शब्द बनाए और फिर उसी आधार पर पूरी भाषा की नींव खड़ी हुई। परंतु इसका भी
बहुत विरोध हुआ। रेनन ने इस सिद्धांत का विरोध इस आधार पर किया कि विश्व का सर्वश्रेष्ठ एवं विकसित प्राणी
होता हुआ भी मनुष्य स्वयं कोई ध्वनि उत्पन्न नहीं कर सका और दूसरों की ध्वनियों का उसे अपनी भाषा बनाने की
लिये सहारा लेना पड़ा। परंतु यह विरोध बहुत तर्क संगत नहीं है । मनुष्य स्वयं ध्वनि अवश्य उत्पन्न करता रहा होगा
पर अन्य जानवरों आदि के नामों या उनकी क्रियाओं के लिये उसने उनकी ध्वनियों के अनुकरण पर शब्दों का अनजाने
ही निर्माण किया होगा । दूसरी बात कि यदि इसे इसी रूप में स्वीकार भी करते तो हर भाषा के कुछ ही शब्दों की
रचना इससे स्पष्ट होती है । जैसे चीनी मिआऊ (= बिल्ली), हिन्दी म्याऊँ (म्याऊँ का मुँह कौन पकड़े) में में (भेंड
की बोली) बे-बे (बकड़ी की बोली) मिमियाना, बिबियाना, दहाड़ना, गरजना, गुर्राना, हिनहिनाना, फटफटियाँ, पों-पों,
घुघ्यू, तथा अंग्रेजी शब्द कक्कू, संस्कृत ‘काक’ (काक इति शब्दानुकृतिः) तथा कोकिल आदि । शेष निन्यानवे प्रतिशत
से भी अधिक शब्दों के बारे में यह मत मौन है। तीसरी बात- कुछ भाषाएँ ऐसी भी हैं जिनमें ऐसे शब्द हैं ही नहीं।
उदाहरणार्थ उत्तरी अमेरिका की ‘अथबस्कन’ में इस प्रकर के शब्दों का नितांत अभाव है। ऐसी भाषाओं की दृष्टि
से इस मत का कोई मूल्य नहीं है। चौथी बात कि इन शब्दों का आधार ध्वनि-अनुकरण होता तो संसार की सभी
भाषाओं में इनके लिये एक-से शब्द होते, किंतु यह आवश्यक नहीं। अनुकरण प्रायः सर्वदा ही अपूर्ण रहता है। यह
आवश्यक नहीं कि शब्द बिल्कुल ही ध्वनि के अनुरूप हो । प्राय: उसमें ध्वनि का थोड़ा या अधिक आधार होता
है और इसलिये एक ही ध्वनि के अनुरूप बने विभिन्न भाषाओं के शब्दों में ध्वन्यात्मक अंतर असम्भव नहीं है।
 
मैक्स मूलर ने मजाक में इसीलिये इसे ‘बाऊबाऊ सिद्धांत’ कह दिया था। बाऊबाऊ, अंग्रेजी में कुत्ते को बोली
को कहते हैं। फिर यह मत नितांत त्याज्य नहीं है, क्योंकि अधिकांश भाषाओं की प्रारंभिक अवस्था में ऐसे शब्द पर्याप्त
रहे होंगे अवश्य।
 
(ख) अनुरणनात्मक अनुकरण भी एक प्रकार का ध्वनि-अनुकरण ही है। धातु, काठ, पानी आदि निर्जीव
चीजों की ध्वनि का अनुकरण ही यह है जैसे झनझनाना, तड़तड़ाना कल-कल, छल-छल, खट-पट आदि । परंतु इससे
भी पूरी भाषा की उत्पत्ति की समस्या का हल नहीं निकलता।
 
(ग) दृश्यात्मक अनुकरण के संदर्भ में तो यह स्पष्ट ही है कि इसके शब्द (बगबग, दगदग, जगजग आदि)
तो प्रत्येक भाषा में अत्यंत कम ही है। जाहिर है, यह सिद्धांत भी बहुत सार्थक प्रतीत नहीं होता।

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