भाषा की परिभाषा

भाषा की परिभाषा

                  भाषा की परिभाषा

भाषा जीवन की वास्तविकता है। इसकी परिभाषा और व्याख्या भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से तथा विविध संदर्भ
में कई प्रकार से की गयी है।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। फलस्वरूप समाज में रहने के कारण उसे हमेशा परस्पर वैचारिक विनिमय
भी करना होता है। ऐसे में कभी तो मनुष्य स्फुट शब्दों या वाक्यों द्वारा अपने को अभिव्यक्त करता है तो कभी कवेल
सर हिलाकर ही अपना काम चला लेता है। कई बार एक-दूसरे को खास अवसर पर निमंत्रित करने के लिये पत्र
लिखे या छपवाए जाते हैं तो कभी हल्दी या सुपारी देकर ही काम चला लिया जाता है। स्काउट्स लोगों का
विचार-विनिमय झडियों द्वारा होता है तो कविवर बिहारी के पात्र ‘भरे मौन में करत हैं नयनन ही सों बात’ । चोर
तो अंधेरे में एक दूसरे का हाथ दबाकर ही अपने को प्रकट कर लिया करता है। ऐसे ही करतल ध्वनि, हाथ हिलाकर
संकेत करना, चुटकी बजाना, आँखें घुमाना, आँखें दबाना, खाँसना, मुँह टेढ़ा करना, उँगली दिखाना तथा गहरी साँसे
लेना- सब साधनों के द्वारा मनुष्य अपने वैचारिक-विनिमय का कार्य कर लेता है। ऐसे सभी साधनों को स्थूल रूप
में तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:
(क) वे साधन जिनके द्वारा अभिव्यक्त विचारों का ग्रहण स्पर्श के द्वारा होता है, जैसे चोरों का हाथ दबाना ।
(ख) वे साधन जिनके द्वारा व्यक्त विचारों को समझने के लिए आँखों की आवश्यकता होती है। हल्दी
बाँटना, स्काउट्स का झंडी दिखाना या हाथ हिलाकर संकेत करना इसी तरह के हैं।
(ग) ऐसे साधन जो वास्तव में सर्वाधिक प्रचलित तथा महत्त्वपूर्ण हैं । इनके द्वारा व्यक्त भावों का ग्रहण कानों
के द्वारा होता है। इनका प्रत्यक्ष संबंध ध्वनि से होता है। करतल-ध्वनि, चुटकी बजाना, आदि विचार-विनिमय के
ऐसे ही साधन हैं।
व्यापक रूप से वैचारिक विनिमय के ये तीनों ही साधन ‘भाषा’ के नाम से अभिहित किये जाते हैं। हालाँकि
साधरणतः भाषा का इतना व्यापक अर्थ लिया नहीं जाता । तृतीय वर्ग के साधन तक ही यह सीमित है। उसमें भी
ध्वनि उत्पन्न करने वाले सभी साधनों को स्थान न देकर केवल बोलने को ही स्थान दिया जाता है। बोलना भी मनुष्यों
का, पशु-पक्षियों का नहीं। गूगों की भी अपनी भाषा है परंतु मनुष्य में भी गूगों की भाषा का इस भाषा से कोई
ताल्लुक नहीं माना जाता । स्पष्ट है, वैसा बोलना जिनके द्वारा परस्पर बातचीत की जा सकती हो।
भाषा की परिभाषा की यह ऐसी भूमिका है जिसके आधार पर भी भाषा की ठीक-ठीक परिभाषा देना बहुत
आसान नहीं है, क्योंकि परिभाषाओं में प्रायः ही अतिव्याप्ति या अव्याप्ति दोष आ जाते हैं।
भाषा की अनेक परिभाषाएँ दी गई हैं:-
1. भाषा शब्द संस्कृत की ‘भाष’ धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है- बोलना, या कहना। अर्थात् भाषा
वह है जिसे बोला जाय।
2. प्लेटो ने ‘सोफिस्ट’ में विचार और भाषा पर यों विचार किया है कि विचार और भाषा में थोड़ा ही अंतर
है। विचार आत्मा की मूक या अध्वन्यात्मक बातचीत है, पर वही जब ध्वन्यात्मक होकर होठों पर प्रकट होती है तो
उसे भाषा की संज्ञा देते हैं।
3. स्वीट के अनुसार “ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा विचारों को प्रकट करना ही भाषा है।”
4. वेन्द्रेज कहते हैं-“भाषा एक तरह का चिन्ह है। चिन्ह से आशय उन प्रतीकों से है जिनके द्वारा मानव
अपना विचार दूसरों पर प्रकट करता है। ये प्रतीक कई प्रकार के होते हैं, जैसे नेत्रग्राह्य, श्रोत्रग्राह्य और स्पर्शग्राह्य ।
वस्तुत: भाषा की दृष्टि से श्रोत्रग्राह्य प्रतीक ही सर्वश्रेष्ठ है।”
आधुनिक भाषा-शास्त्रियों में अधिकांश ने भाषा की परिभाषा लगभग एक-सी दी है। उनमें से कुछ के विचार यो हैं:
1. ब्लॉक तथा ट्रेगर ने भाषा की परिभाषा यों दी है-“ए लैंग्वेज इज ए सिस्टम ऑफ आरबिट्रोरी वोकल
सिम्बल्स बाइ मीन्स ऑफ ह्विच ए सोसायटी ग्रुप कोआपरेट्स ।”
2. स्त्रतेवाँ–“ए लैंग्वेज इज ए सिस्टम ऑफ आरबिट्रेरी वोकल सिम्बलस बाइ मीन्स ऑफ ह्विच मेम्बर्स ऑफ
ए सोशल ग्रुप कोअपरेट एड इंटरेक्ट ।”
3. ‘इनसाइक्लोपीडिया’ ब्रिटेनिका में यों परिभाषा दी गयी है-“लैंग्वेज में बी डिफाइन्ड एज एन आरबिटी
सिस्टम ऑफ वोकल सिम्बल्स बाइ मीन्स ऑफ हिच ह्यूमन बीइंगस एज मेम्बर्स ऑफ ए सोसल ग्रूप एंड पार्टिसिपेन्टर
इन कल्चर इन्टरेक्ट एंड कम्युनिकेट ।”
4. हैलिडे ने यों परिभाषा दी है-“लैंग्वेज केन बी थॉट ऑफ एज ऑरगेनाइज्ड न्वायज यूज्ड इन सिचुएशंस
एक्चुअल सोशल सिचुएशन ऑर इन अदर वर्ड्स कन्टेक्स्चुअलाइज्ड सिस्टेमिक साउन्ड”
5. क्रोचे ने कहा-“लैंग्वेज इज आर्टिकुलेटेड लिमिटेड साउन्ड आरगेनाइज्ड फॉर द परपस ऑफ एक्सप्रेशन।”
वास्तव में इन सभी परिभाषाओं पर गौर करें तो सभी में अव्याप्ति दोष है। धातु के अर्थ पर आधारित परिभाष
में अव्याप्ति और अतिव्याप्ति-दोनों तरह के दोष हैं। भाषा अपने व्यापकतम रूप में “वह साधन है जिसके माध्यः
से हम सोचते हैं तथा विचारों या भावों को अभिव्यक्त करते ।” किंतु भाषा-विज्ञान में जिस भाषा का
अध्ययन-विश्लेषण किया जाता है, वह भाषा इतनी व्यापक नहीं है। भाषा का वह रूप अपेक्षाकृत बहुत सीमित है।
भाषा के इस सीमित रूप को दृष्टि में रखकर ही ऊपर की परिभाषाएँ रची गई
हैं। यह जरूर है कि इनमें कई अच्छी परिभाषाएँ हैं।
तत्वतः भाषा में कुछ मूलभूत बातें यों होती हैं:
(क) भाषा प्रयोक्ता के विचारादि को श्रोता या पाठक तक पहुँचाती है । स्पष्ट ही यह विचार विनिमय का साधन है।
(ख) भाषा निश्चित प्रयत्ल के फलस्वरूप मनुष्य के उच्चारणावयवों से नि:सृत ध्वनि-समष्टि होती है। स्पष्ट
है अन्य साधनों से अन्य प्रकार की ध्वनियाँ (जैसे चुटकी बजाना, ताली बजाना आदि) से भी विचार-विनिमय हो
सकता है किंतु वे भाषा नहीं हैं।
(ग) भाषा में प्रयुक्त ध्वनि-समष्टियाँ (या शब्द) सार्थक तो होती है किंतु उनका भावों या विचारों से कोई
सहजात संबंध नहीं होता। यह संबंध ‘यादृच्छिक’ या ‘माना हुआ’ होता है। इसीलिये भाषा में यादृच्छिक
ध्वनि-प्रतीक होते हैं। आशय स्पष्ट है कि किसी ध्वनि-समष्टि या शब्द का जो अर्थ है, वह मात्र परंपरा के कारण
यों ही बिना किसी नियम या कारण आदि के मान लिया गया है। यदि यह संबंध सहजात, स्वाभाविक या नियमित
होता तो सभी भाषाओं में शब्दों का साम्य होता । अंग्रेजी में यदि व, आ, ट, अ, र (वाटर) के योग को पानी समझता
है तो इसका हिन्दी पर्याय भी लगभग वही होता है। यह ‘प, आ, न, ई’ (पानी) का योग न होता । इसी कारण
एक ही वस्तु भाव या विचार के लिये विभिन्न भाषाओं में विभिन्न शब्द मिलते हैं
ध्वन्यात्मक शब्दों के विषय में लोगों की ऐसी धारणा है कि यदि अन्य नहीं तो कम-से-कम ध्वन्यात्मक शब्दों
में अर्थ का संबंध अवश्य ध्वनि से है। निस्संदेह, ध्वन्यात्मक (तड़तड़, धड़धड़, भों-भों आदि) शब्दों में अर्थ का
कुछ-न-कुछ संबंध ध्वनि से अवश्य है किंतु वह इतना अधिक नहीं है जितना लोग मानते हैं। यदि यह संबंध पूर्ण
होता तो सभी भाषाओं में ‘तड़तड़ाहट’ को ‘तड़तड़ाहट’ ही कहते । कुत्ते सारे संसार में प्रायः एक-से भूकतं हैं।
जाहिर है उनके बूंकने की ध्वनि के लिये प्रयुक्त शब्द सारी भाषाओं में एक-या एक-से होने चाहिये । परंतु ऐसा
है नहीं। जैसे हिन्दी ‘भों भों’ या ‘भौं भौं’, अंग्रेजी ‘बाउ-बाऊ’, गुजराती भस-भस’, फ्रांसीसी ‘नफ-नफ’, जापानी,
‘वान-वान’ रूसी ‘गफ-गफ’, उजबेक-‘वोब-वोब’, तथा तमिल-‘कोल कोल’ आदि । इसका अर्थ यह है कि एक
ही ध्वनि के लिये विभिन्न भाषाओं में थोड़े-बहुत अनुकरण का सहारा लेते हुए बिना किसी खास नियम या पूर्ण
व्यवस्था के ही ये शब्द बना या मान लिये गये हैं। सो, यदि शब्द या भाषा में प्रयुक्त ये सार्थक ध्वनि-समष्टियाँ
यों ही मानी हुई या यादृच्छिक न होती तो संसार की सभी भाषाएँ-लगभग एक सी होतीं। हालाँकि यह भी सच है
कि इस यादृच्छिकता की भी एक सीमा है क्योंकि ‘वायुयान’, रेलगाड़ी, घुसपैठिया जैसे शब्द यादृच्छिक न होकर
साधार और सुचिंतित हुए हैं।
(घ) भाषा में एक व्यवस्था होती है। भाषा अव्यवस्थित होती ही नहीं। व्याकरण में उसी व्यवस्था का
विवेचन होता है। प्राचीन काल में भाषा अधिक अव्यवस्थित रही होगी। विकास के क्रम में भाषा अधिक व्यवस्थित
हुई है। एसपेरेंतो’ जैसी कृत्रिम भाषाएँ तो पूर्णत: व्यवस्थित हैं। उनमें अपवाद जैसी कोई स्थिति नहीं हैं।
(ङ) एक भाषा का प्रयोग एक विशेष वर्ग या समाज में होता है। उसी में वह बोली और समझी जाती है।
इस प्रकार ऊपर निर्दिष्ट समस्त विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए भाषा की एक सर्वमान्य परिभाषा यों बनाई
जा सकती है-
“भाषा उच्चारण अवयवों से उच्चारित मूलतः प्रायः यादृच्छिक ध्वनि-प्रतीकों की वह व्यवस्था है, जिसके द्वारा
किसी भाषा-समाज के लोग आपस में विचारों का आदान-प्रदान करते हैं।”

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