भाषा-विज्ञान की उपयोगिता और उसका अन्य शास्त्रों से संबंध

भाषा-विज्ञान की उपयोगिता और उसका अन्य शास्त्रों से संबंध

         भाषा-विज्ञान की उपयोगिता और उसका अन्य शास्त्रों से संबंध

आज के इस वैज्ञानिक युग में जहाँ हर कुछ को कार्य-कारण संबंध के तर्क से प्रमाणित करना चाहते हैं; हमारी
बुद्धिग्राह्यता की यह पहली शर्त भी बन गयी है। अस्तु भाषा-विज्ञान के माध्यम से भाषा के संबंध में हुई हमारी
सारी जिज्ञासा की तृप्ति होती है। इसके द्वारा प्राचीन तथा प्रागैतिहासिक काल की संस्कृति पर भी प्रकाश पड़ता है।
भाषा विज्ञान के ही आधार पर किसी जाति या संपूर्ण मानव जाति के मानसिक विकास का प्रत्यक्षीकरण संभव हो
पाता है। प्राचीन साहित्य के अर्थ, उच्चारण तथा प्रयोग प्रभृति समस्याओं के समाधान को भी हम भाषा-विज्ञान के
द्वारा संभव कर पाते हैं । यह भाषा-विज्ञान ही है जिसके आधार पर संपूर्ण विश्व के धरातल पर चल सकने वाली
कृत्रिम भाषा एस्पेरैंतो का विकास संभव हो पाया है। विदेशी भाषाओं को सीखने के साथ ही अपनी मातृभाषा को
भी सीखने में परिपूर्णता इसी की मार्फत संभव कर पाते हैं।
 
किसी भाषा के सफल रूपांतरण में भी भाषा वैज्ञानिक उपादानों की मदद लेते है। अनुवाद करने वाली, स्वयं
टाइप करने वाली टाइपराइटर तथा ऐसी ही अन्य मशीनों के निर्माण और विकास में भाषा-विज्ञान का योगदान है।
भाषा-लिपि में सरलता एवं शुद्धता की दृष्टि से परिवर्तन-परिवर्द्धन करने में सहायता मिलती है। किसी भाषा के लिये
लिपि, उसका व्याकरण, कोश तथा उसे पढ़ाने के लिये पाठ्य-पुस्तकें बनाने में इसके द्वारा सहयोग मिलता है।
तुतलाहट, हकलाहट, अशुद्ध उच्चारण, अशुद्ध श्रवण आदि दूर करने में ‘भाषा-विज्ञान’ से बड़ी सहायता प्राप्त होती
है। मनोविज्ञान, प्राचीन भूगोल, शिक्षा, समाज-विज्ञान, दर्शन आदि तथा अभियंत्रणा एवं संचार में भाषा-विज्ञान की
प्रभूत सहायता ली जाती है। इस प्रकार भाषा विज्ञान के अध्ययन के अनेक लाभ हैं।
 
भाषा-विज्ञान का मनुष्य के ज्ञान को अभिवृद्ध करने वाले अन्य शास्त्रों से काफी नजदीक का संबंध है। इनमें
से ज्ञान के ऐसे अनेक क्षेत्र हैं जो एक दूसरे से संबंद्ध हैं।
 
1. भाषा-विज्ञान और व्याकरण-भाषा का सर्वाधिक निकट संबंध व्याकरण से है । प्रतिदिन के भिन्न-भिन्न
प्रकार के सुने जाने वाले शब्दों के प्रति जो मन में कुतूहल पैदा होता है, उनकी व्युत्पत्ति का हल भाषा विज्ञान करता
है। पारिभाषिक शब्द एवं लिपि की समस्याओं का भी समाधान भाषा-विज्ञान ही करता है। यहाँ तक कि ऐतिहासिक
खोजों का काल भी भाषा-विज्ञान के ही द्वारा हो पाता है। जिस पर शब्दों के भिन्न-भिन्न रूपों और अर्थों पर यह
शास्त्र विचार करता है, उसी प्रकार यह भाषा के उद्भव और विकास तथा हास का भी रहस्य उद्घाटित करता है।
भाषा-विज्ञान ज्ञान की पिपासा की शांति के साथ ही पाठक को वैज्ञानिक क्रिया में भी दीक्षित करता है। दृष्टि में
फैलाव आता है और अपनी भाषा या उपभाषा की सीमा में आबद्ध न रहकर विस्तृत बनता है।
 
भाषा-विज्ञान से व्याकरण और साहित्य के अध्ययन में भी सुविधा होती है। प्राचीन भाषाओं के व्याकरण-निर्माण
भी आसानी होते हैं। मैकडानल कृत ‘वैदिक व्याकरण’ इसका उदाहरण है।
भाषा-विज्ञान ने ही तुलनात्मक विज्ञान को जन्म दिया है। प्राचीन भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन से पौराणिक
कथाओं के स्वभाव, उद्भव और विकास का भिन्न-भिन्न मानव-जातियों के विश्वासों और मतों के इतिहास का पता
चलता है। भाषा-विज्ञान शब्दों के द्वारा मानव-समाज के प्राचीनतम इतिहास की खोज करता है। भाषा-विज्ञान ने
ही जातीय मनोविज्ञान, जातिविज्ञान, मानव-विज्ञान आदि में नयी-नयी खोजें की हैं। भारतीय भाषा-परिवार की संस्कृत,
ग्रीक एवं गॉथिक आदि भाषाओं के वैज्ञानिक अध्ययन द्वारा भारोपीय जातियों के पूर्वजों की सभ्यता एवं संस्कृति की
खोज की है। आर्यों के वास-स्थान की खोज में भी भाषा-विज्ञान ने सर्वाधिक सहायता पहुँचाई है । शब्दों के इतिहास
से ही विचारों का इतिहास और उसके द्वारा किसी जाति की सभ्यता का इतिहास निष्पन्न होता है। प्राचीन मानव की
प्रवृत्तियों को जानने में भी इससे सहायता मिलती है। भाषा-विज्ञान एवं व्याकरण की सर्वाधिक निकटता के कारण
कभी-कभी दोनों को एक ही मान लिया जाता है । वस्तुत: व्याकरण से भाषा के प्रयोग की शुद्धता-अशुद्धता का ज्ञान
होता है जबकि भाषा-विज्ञान भाषा के कब, कहां और कैसे प्रयोग को ध्यान में रखता है। व्याकरण में विवरण और
वर्णन का प्राधान्य होता है, भाषा-विज्ञान में विवेचन और विश्लेषण का । वास्तव में एक अर्थ में भाषा-विज्ञान
व्याकरण का भी व्याकरण है। भाषा के अध्ययन में दोनों एक दूसरे के पूरक भी हैं एक दूसरे पर आश्रित भी।
भाषा-विज्ञान जाने बगैर अच्छा व्याकरण लिखना कठिन है। भाषाओं के विश्लेषण से भाषा-विज्ञान व्याकरण से
पर्याप्त सामग्री और सहायता लेता है। व्याकरण का संधि-प्रकरण पूरी तरह भाषा-विज्ञान पर आधारित है।
रूप-विज्ञान तथा वाक्य-विज्ञान सारी की सारी मूलभूत सामग्री व्याकरण से लेते हैं।
 
2. साहित्य-भाषा के अध्ययनार्थ भाषा-विज्ञान जीवित भाषाओं के जीवित रूप को छोड़कर सारी सामग्री
साहित्य से लेता है। साहित्य के ही आधार पर भाषाओं के परिवार के विषय में जान पाते हैं। किसी भी भाषा के
ऐतिहासिक विकास को भी हम उसके साहित्य द्वारा ही जान पाते हैं। जाहिर है भाषा के तुलनात्मक और ऐतिहासिक
दोनों ही स्तर के अध्ययन के लिये साहित्य की सहायता की जरूरत होती है। दूसरी ओर साहित्य भी भाषा- विज्ञान
से सहायता लेता है। किलष्ट अर्थों एवं विचित्र प्रयोगों तथा उच्चारण संबंधी समस्याओं पर भाषा-विज्ञान ही प्रकाश
डालता है। हमें मालूम है कि डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल ने भाषा विज्ञान के सिद्धांतों के आधार पर जायसीकृत
‘पद्मावत’ के बहुत से शब्दों को उनके मूल रूपों से जोड़कर उनके अर्थों को स्पष्ट किया है । शुद्ध पाठ के निर्धारण
में भी इससे सहायता ली है।
 
3. मनोविज्ञान-भावों और विचारों का सीधा संबंध मस्तिष्क तथा मनोविज्ञान से है। भाषा की आंतरिक
गुत्थियों को सुलझाने में भाषा-विज्ञान मनोविज्ञान से मदद लेता है। अर्थ-विज्ञान तो पूर्णत: मनोविज्ञान पर आधारित
है। वाक्य-विज्ञान, ध्वनि-परिवर्तन, भाषा की उत्पत्ति, उसके प्रारंभिक रूप को जानने में बाल-मनोविज्ञान तथा
अविकसित लोगों का मनोविज्ञान हमारी बहुत सहायता करता है। दूसरी ओर पागलों के मनोवैज्ञानिक उपचार में
मनोविज्ञान से पर्याप्त सहायता मिलती है। विचारों के विश्लेषण में भी भाषा-विज्ञान से सहायता मिलती है। दोनों के
इस घनिष्ठ संबंध के कारण ही अब भाषा-विज्ञान की एक नयी शाखा मनोभाषा-विज्ञान अस्तित्व में आ गयी है।
 
4. शरीर-विज्ञान-भाषा मुख से निकली ध्वनि है अस्तु भाषा-विज्ञान में हवा मुहँ के भीतर से कैसे चलती
है, स्वर-यंत्र स्वर तंत्री-नासिका विवर, तालु, दाँत, जीभ, ओठ, कंठ, मूर्द्धा तथा नाक के कारण उसमें क्या परिवर्तन
होते हैं, कान ध्वनि को कैसे ग्रहण करता है-इन सबका अध्ययन होता है जिसमें शरीर-विज्ञान सहायता करता है।
इसी प्रकार सुर लहर, अक्षर-बलाघात आदि का अध्ययन भी शरीर विज्ञान के बिना संभव नहीं है।
 
5. भूगोल-भाषा-विज्ञान से भूगोल का घनिष्ठ संबंध है। भूगोल देशों, नगरों, नदियों तथा प्रांतों आदि के
नामों के रूप में भाषा-विज्ञान को अध्ययन की मनोरंजक सामग्री प्रस्तुत करता है। भूगोल से अर्थविज्ञान को भी
सहायता मिलती है। इसी से ‘भाषा-भूगोल’ नामक अलग भाषा-वैज्ञानिक शाखा भी अस्तित्व में आई। दूसरी ओर
किसी स्थान के प्रागैतिहासिक काल को भूगोल के अध्ययन में भाषा-विज्ञान भी पर्याप्त सहायता करता है।
 
6. इतिहास का भी भाषा-विज्ञान से गहरा संबंध है। इस अर्थ में राजनीतिक इतिहास, धार्मिक इतिहास तथा
सामाजिक इतिहास तीनों का भाषा-विज्ञान के अध्ययन में प्रचुर उपयोग होता है। किसी देश में किसी अन्य देश का
शासन होना दोनों ही देशों की भाषाओं को प्रभावित करता है। भारतीय भाषाओं में अंग्रेजी, फारसी, अरबी, तुर्की और
पुर्तगाली शब्दों का होना तथा इन भाषाओं में भी हिन्दी-संस्कृत शब्दों का होना इसी कारण संभव हुआ है। धर्म के
रूप-परिवर्तन का भाषा पर भी प्रभाव पड़ता है। भारत में तो हिन्दी-उर्दू समस्या धर्म या संप्रदाय की ही देन है। धर्म
से व्यक्तिवाचक नामों पर प्रकाश पड़ता है। दूसरी ओर धर्म के प्राचीन रूप की बहुत-सी गुत्थियाँ भाषा-विज्ञान से
सुलझायी जाती हैं।
 
सामाजिक व्यवस्था तथा परंपराओं का भी भाषा पर प्रभाव पड़ता है तो दूसरी ओर भाषा का भी समाजिक
इतिहास पर पूरा प्रकाश पड़ता है। स्पष्ट है भाषा-विज्ञान तथा सामाजिक इतिहास एक-दूसरे के सहायक हैं।
सामाजिक व्यवस्था के अंतर के कारण ही जहाँ भारतीय भाषाओं में माँ, बाप, चाचा, बहन तथा भाई के अतिरिक्त
साला, बहनोई, मौसा-मौसी, फूफा, फूआ, दादा, परदादा, ससुर तथा सास जैसे शब्द भी है वहीं यूरोपीय भाषाओं में नहीं।
 
7. भौतिक-शास्त्र-मुंह से निकलने वाली ध्वनि कान तक पहुँचने के पूर्व आकाश में लहरों के रूप में चलती
है। भौतिक-शास्त्र इन लहरों के अध्ययन में हमारी मदद करता है। खासकर प्रयोगात्मक ध्वनि शास्त्र के अध्येता
भाषा-विज्ञान के इस क्षेत्र के अध्ययन में भौतिक शास्त्र से बहुत लाभ उठा रहे हैं । स्वर और व्यंजन के तात्त्विक रूप
पर भौतिक-शास्त्र के आधार पर इधर बहुत प्रकाश डाला गया है।
 
8. तर्कशास्त्र-व्याख्या प्रधान होने के कारण भाषा-विज्ञान को तर्कशास्त्र से सहायता लेनी ही पड़ती है।
भारत के यास्क मुनि ने अपने अर्थविज्ञान परक प्रसिद्ध ग्रंथ ‘निरुक्त’ में तर्कशास्त्र से बहुत सहायता ली है। तर्कशास्त्र
भी भाषा-विज्ञान का कम ऋणी नहीं है। तर्क भाषा के ही सहारे चलता है।
 
9. मानव-विज्ञान-मानव के विकास का पर्याय ही भाषा है क्योंकि भाषा स्वयं मानव के विकास का प्रतीक
है। फलतः दोनों ही एक दूसरे से अपने अध्ययन के लिये सामग्री लेते हैं। अंधविश्वासों का लेखा-जोखा
मानव-विज्ञान में होता है और इन अंधविश्वासों का भाषा पर भी पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। लगातार संतान के मरते
जाने के बाद पैदा हुए बच्चे का नाम रद्दी नाम यथा-जोखू, छेदी, बेंचू, घुरहू, कतवारू, अलियार या लेंढा रख देते
हैं । स्त्रियाँ पति का नाम नहीं लेतीं । क्रिया रूप में भी घुमाफिरा कर ही प्रयोग मिलते है । भाषा की उत्पत्ति और उसके
प्राचीन रूप तथा लिपि की उत्पत्ति आदि के अध्ययन में भी मानव-विज्ञान से भरपूर सहायता ली जाती है।
अंधविश्वास के अतिरिक्त और भी सामाजिक मनोविज्ञान से संबंद्ध बहुत-सी गुत्थियाँ है जिनके उदाहरण भाषा
में मिलते हैं और उसके स्पष्टीकरण के लिये भाषा-विज्ञान को मानव-विज्ञान की शाखाओं-प्रशाखाओं का सहारा
लेना पड़ता है।
 
10. दर्शनशास्त्र-दर्शन और भाषा-विज्ञान-दोनों में घनिष्ठ संबंध है। भारत में मीमांसकों, नैयायिकों आदि
दार्शनिकों ने इसी कारण अपने विषय पर विचार करते समय भाषा-विज्ञान की भी अनेक बातों पर विचार किया है।
जैसे मीमांसा के अन्विताभिधानवाद सिद्धांत के अनुसार भाषा में वाक्य की ही सत्ता मूल है, ‘पद’ उसी के तोड़े गये
अंश हैं किंतु अभिहितान्वयवाद के अनुसार ‘पद’ की ही सत्ता है, वाक्य उसका जोड़ा हुआ रूप है। भाषा-विज्ञान
की अर्थ-विज्ञान शाखा को तो लोग बहुत दिनों तक दर्शन के ही अंतर्गत मानते रहे हैं। भाषा, भाषा-विज्ञान और
व्याकरण का भी तो अपना दर्शन होता ही है।
इस प्रकार सांख्यिकी, भाषा-शिक्षण, काव्य-शास्त्र, यांत्रिकी आदि ज्ञान-विज्ञान की अन्य शाखाओं से भी
भाषा-विज्ञान का संबंध है।

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