भाषा-शिक्षण

भाषा-शिक्षण

               भाषा-शिक्षण

भाषा यादृच्छिक होती है, रूढ़ ध्वनि-संकेत प्रणाली होती है। तभी उसका भाव और अभिप्राय के अनुसार भेद प्रतीत होता है। भाषा एक निश्चित व्यवस्था होती है जिससे एक विशेष वर्ग या समाज अपनी अभिव्यक्ति करता है। प्राय: ही बोलीगत प्रकारों एवं प्रचलन के कारण अनेक शब्दों का अशुद्ध उच्चारण तथा वर्तनी के अशुद्ध प्रयोग मिलते हैं।
     भाषा-शिक्षण के संबंध में मानवीय अभिव्यक्ति के उन ठोस आधारों को नहीं भूलना चाहिये जो उसकी अभिव्यक्ति पर यथेष्ट प्रभाव डालते हैं
 
(1) सामाजिक, (2) आर्थिक (3) सांस्कृतिक, (4) मानसिक, तथा (5) बौद्धिक
 
    इन सभी प्रभावों तथा परिस्थितियों में अभिव्यक्ति की व्यंजना व्यक्तित्व को उसी समय प्रभावशील बनाती है जब मानव में भाषा को प्रभावोत्पादक तरीके से प्रयोग करने की समर्थता आती है। यह समर्थता दो रूपों में आती है:
(1) यथार्थ रूप में
(2) अनुभव द्वारा
 
      भाषा-शिक्षण की दिशा में ज्ञान के इन दोनों स्वरूपों का विशेष महत्व है। प्रत्यक्ष ज्ञान ही तो यथार्थ होता है जो परिस्थितियों के बीच अनुभवों के माध्यम से प्राप्त होता है। अनुकरणात्मक ज्ञान अथवा अनुशंसात्मक ज्ञान इसी का एक अंग होता है। प्रत्यक्ष ज्ञान के दो आधार होते हैं :
(1) श्रवणेंद्रियाँ 
(2) नेद्रियाँ
 
           श्रवणेद्रियों द्वारा किसी वस्तु के संबंध में सुनने, बोलने से जो ज्ञान प्राप्त होता है, वह अनुकरणात्मक या अनुशंसात्मक ज्ञान होता है। इस स्थिति में कान तथा वाक् दोनों यंत्रों की परस्पर क्रियान्विति होती है। कान से जैसा सुना गया वैसा ही अनुकरण करते हुए उसे वाक् यंत्र द्वारा बोलने का प्रयास किया जाता है। नेत्र और वाक-यंत्रों की सक्रियता प्रमाणित होती है।
     भाषा-शिक्षण में द्वितीय स्थिति को बालकों के लिये अधिक उपादेय माना गया है। नेत्रंद्रिय से प्राप्त ज्ञान श्रवणेंद्रिय से प्राप्त ज्ञान की अपेक्षा अधिक विश्वसनीय, स्थायी एवं पूर्ण होता है। बालक में उसके प्रति सहज, स्वाभाविक जिज्ञासा होती है। नेत्रंद्रिय ज्ञान के लिये आज अनेक यंत्र उत्पन्न किये गये हैं जिन्हें ऑडियो विजुअल-एड्स (A.V.A) कहा जाता है जिसकी चर्चा आगे की जायगी।
 
        भाषा वास्तव में कौशल-प्रधान ज्ञान है जिसे संगीत की तरह ही अनुकरण तथा अभ्यास के द्वारा सीखना होता है। भाषा का अस्तित्व भाषण क्रिया के द्वारा प्रकट होता है। भाषण का अर्थ है-बातचीत, बोलचाल । भाषण में वक्ता तथा श्रोता को संयुक्त किया होती है। बोलने और सुनने की क्रिया के द्वारा ही भाषा का अस्तित्व प्रकट होता है। लेखन किया भाषा से संबद्ध है। उच्चरित स्वनों का लिपि संकेतों में ओंकेत करना हो लेखन है। लिपि संकेतों में ऑकत अथवा संकेत तथा संकेतित स्वनों के संबंध को पहचानना । लेखन तथा वाचन को क्रियाएँ लिपि- संकेतों पर आधारित हैं। लेखन-वाचन भाषा के अस्तित्व के अनिवार्य आधार नहीं हैं। भाषा-क्रिया का ही दूसरा रूप लिखित भाषा है। क्रिया के बिना लिखित भाषा का अस्तित्व नहीं। वैसे तो ‘लिखित भाषा’ पद ही निरर्थक है।
व्यावहारिक दृष्टि से भाषा सीखने का अर्थ है-भाषण-किया सीखना तथा लेखन-वाचन सीखना। अतएव
भाषा-शिक्षा के लिये श्रवण, भाषण, लेखन, वाचन-चारों क्रियाओं को अपनाया जाता है। इनमें श्रवण-भाषण की कियाएँ ही भाषा के प्रयोग के मुख्य कौशल हैं, लेखन-वाचन को क्रियाएँ भाषा-प्रयोग के गौण कौशल है;
  लेखन-वाचन भाषा के अतिरिक्त ‘लिपि-शिक्षण’ को अपेक्षा रखते हैं परंतु लिपि-शिक्षण स्वतंत्र विषय है जो भाषा से भिन्न है।
        श्रोता जब वक्ता की भाषा के स्वनों को सुनकर उनके द्वारा संप्रेषित अर्थतत्व को पहचान सके-तभी वह बात समझ सकता है। यह एक कौशल भी है। यह श्रवण-कौशल कान की नैसर्गिक सुनने की शक्ति पर आधारित है ध्यान देने की बात है कि भाषा-शिक्षण का प्रमुख उद्देश्य केवल भाषा-व्यवहार की नकल करना नहीं है, बल्कि ऐसो दक्षता उत्पन्न कर देना है जिससे अध्येता में भाषायी सर्जनात्मकता उत्पन्न हो यानी वह अपनी सोखो हुई भाषा का स्वयं नए-नए ढंग से नए संदर्भो में प्रयोग कर सके। कभी यह भी संभव होता है कि शिक्षक भाषा के कुछ अंशों को अध्येता के सम्मुख प्रस्तुत कर उससे उसका अभ्यास करा दें। ऐसा अभ्यास कभी इतना सफल होता है कि प्रस्तुत करनेवाले व्यक्ति की पूरी नकल अध्येता कर लेता है, पर यह भाषायी दक्षता नहीं कही जाएगी । वास्तव में भाषा
पर अधिकार’ करने का अर्थ है भाषायी दक्षता और सर्जनात्मक शक्ति प्राप्त करना । जिस शिक्षण विधि से इस लक्ष्य की पूर्ति हो, वही सफल विधि मानी जाएगी।
      किसी भी भाषा के सफल शिक्षण के लिये आवश्यक है कि भाषाओं के सामान्य रूप, उनको सामान्य प्रकृति और जिस भाषा का शिक्षण अभीष्ट है उसकी सामग्री (भाषा वस्तु) का सम्यक अध्ययन । भाषा शिक्षण के लिये वर्णित विषय वस्तु में स्वतंत्र भाषा के अवयवों के विश्लेषण, संकलन, निर्वाचन, वर्गीकरण और क्रमानुयोजन को उसी प्रकार आवश्यकता है जिस प्रकार किसी अन्य विषय के शिक्षण में होती है।
 

भाषा-वस्तु के अवयव :

(अ) विविध ध्वनियाँ, स्वतंत्र और संयुक्त ध्वनियाँ, अन्य ध्वनियों के सान्निध्य में रूपांतरण और सप्रवाह वाणी का संगीत और तत्संबंधी नियम।
 
(आ) लिपि अर्थात् वाणी का लिखित रूप, विभिन्न लिपि-प्रतीक और उनका संयोग, तत्संबंधी नियम ।
 
(इ) शब्द और शब्दांश । उपसर्ग और प्रत्यय को हम शब्दांश कह सकते हैं। इनके अतिरिक्त और भी शब्दांग होते हैं जो शब्द-रचना में सहायक होते हैं परंतु स्वतंत्र रूप से काम में नहीं आते । उपसर्ग, प्रत्यय, संधि, समास द्बारा शब्द-रचना और उसके नियम ।
 
(ई) शब्द-संस्थान, वाक्यांश संस्थान, वाक्य-संस्थान तथा अभिव्यक्ति के लिये भाषा द्वारा प्रयुक्त विविध
साधन और तरकीबें। शब्द-क्रम, शब्द-विकार, भाषा द्वारा प्रयुक्त विविध रूपक, प्रयोग और मुहावरे इत्यादि ।
        वास्तव में तैरने, साइकिल पर चढ्ने, पतंग उड़ाने की तरह ही भाषा भी शैल्पिक विषय है। भाषा योग्यता के तर्गत पड़ना, लिखना, बोलना, समझना अलग योग्यता है । इसके अलावा शोधता से अर्थ समझ लेना, बहुत शब्दो पर अधिकार कर लेना, बिना शब्दार्थ जाने अर्थ ग्रहण कर लेना, कोश आदि संदर्भ गधों से सहायता लेना आदि पाठन-योग्यता को विधायक उपयोग्यताएँ हैं।
 
प्रतीकों का व्यवस्थित रूप :
    भाषा परंपरागत प्रतीकों का समूह है। अर्थों को व्यक्त करने वाली ध्वनियाँ एक तरह के युक्तिहीन प्रतीक हैं। व्याकरण का अध्ययन करने से भाषाओं का स्वरूप समझने में सहायता मिलती है।

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