रामवृक्ष बेनीपुरी

रामवृक्ष बेनीपुरी

                    रामवृक्ष बेनीपुरी

कलम के जादूगर रामवृक्ष बेनीपुरी (1902-1968) स्वतंत्रता आंदोलन में
सक्रिय रहने के कारण 1920 ई. में मैट्रिक से आगे पढ़ाई न कर पाए। एक हाथ
में कलम और दूसरे हाथ में खादी का तिरंगा लेकर चलनेवाले बेनीपुरी के
साहित्य का अधिकांश जेल की सलाखों के पीछे रचा गया। गद्य साहित्य की
विविध विधा में सजीव ओजपूर्ण शैली इन्हें प्रथम श्रेणी में रखने को बाध्य है।
 
संपादक के रूप में भी अपने तरुण भारत (साप्ताहिक), किसान मित्र
(साप्ताहिक), बालक (मासिक), युवक (मासिक), लोक संग्रह, कर्मवीर,
योगी, जनता, हिमालय, नई धारा, चुन्नू-मुन्नू, इत्यादि का संपादन किया ।
संपादकीय में मुक्त एवं निर्भीक वचार देते रहे । आपकी प्रकाशित एवं
अप्रकाशित रचनाओं की संख्या साठ से अधिक हैं। बेनीपुरी ग्रंथावली को दस
खण्डों में प्रकाशित करने का प्रयास जारी है और चार खण्ड प्रकाशित हो चुके
हैं। माटी की मूरतें, पतितों के देश में, लालतारा, चिता के फूल, कैदी की
पत्नी, गेहूँ और गुलाब, अम्बपाली, सीता की माँ, संघमित्रा, अमर ज्योति,
तथागत, सिंह विजय, शकुन्तला, रामराज्य, नेत्रदान, गाँव के देवता, नया
समाज, विजेता इत्यादि आपकी उल्लेखनीय पुस्तकें हैं ।
 
बेनीपुरीजी ने मंगर शब्द-चित्र के माध्यम से एक परिश्रमी किन्तु स्वाभिमानी,
बाहर से कुरूप• किन्तु अन्दर से सुन्दर, कृषक-मजदूर मंगल की दारुण
जीवन-कथा को अत्यन्त मार्मिक अभिव्यक्ति प्रदान की हैं मंगर बाहर से भले
ही काला-कलूटा हो लेकिन, उसकी आत्मा की उज्जवलता ‘उसके चेहरे की
कालिमा को अपूर्व आभा से अलोकित कर देती है। यह आभा उसी के चेहरे
पर आ सकती है जो अपनी डेढ़ रोटियों में से भी आंधी रोटी के टुकड़े कर
मालिक के ही दोनों बैलों को दे दे ।

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