शब्दों का वर्गीकरण : शब्द-निर्माण की दिशाएँ

शब्दों का वर्गीकरण : शब्द-निर्माण की दिशाएँ

                     शब्दों का वर्गीकरण : शब्द-निर्माण की दिशाएँ

वैसे तो व्याकरणिक दृष्टि से शब्दों को आठ वर्गों में बाँटा गया है किंतु येस्पर्सन जैसे भाषाविदों ने इस वर्गीकरण
को व्यावहारिक तो माना है परंतु कई कारणों से इसे बहुत गंभीर नहीं माना । भारत में प्रारंभिक तौर पर नाम, आख्यात्,
उपसर्ग और निपात रूप में जो चार या सुबन्त तिङन्त एवं अव्यय के रूप में जो तीन वर्ग बताए गये हैं, वे भी अपेक्षया
ठोस एवं एक सीमा तक तर्काद्धृत होते हुए भी बहुत दूर तक टिक नहीं पाते । शब्दों के कार्य और स्थूल आपद्धर्म
को छोड़ दें तो शब्दों के वर्गीकरण के मुख्य रूप से दो ही आधार बचते हैं; रचना का आधार और इतिहास का
आधार । रचना के आधार पर शब्दों के तीन भेद किये गये हैं: रूद, योगिक और योगरूढ़ । रुढ शब्द वे होते हैं
जिनके उस अर्थ में सार्थक टुकड़े न हो सकें जैसे भैंस, जल, कलम आदि । यौगिक शब्द उन शब्दों को कहते हैं,
जो दो शब्दों या दो सार्थक लघुतम भाषिक इकाइयों के योग से बने हों। उदाहरणार्थ ‘ग्राममल्ल’ दो शब्दों के योग
से बना है और कलमदान या ‘सुंदरता’ शब्द और प्रत्यय से । योगरूढ़ उन्हें कहते हैं जो दो से बने हैं, किंतु जिनका
अर्थ विशेष अर्थ में संकुचित हो गया है, जैसे ‘पंकज’ । इसका अर्थ पंक अर्थात कीचड़ से उत्पन्न सभी चीजें या
वनस्पतियाँ न होकर केवल ‘कमल’ है। शब्द को हम लघुतम इकाई कह चुके हैं। उस दृष्टि से स्पष्ट ही इन तीनों
में तत्वतः प्रथम ही शब्द है, शेष दो प्रयोगतः शब्द होते हुए भी प्रकृत्याः लघुतम इकाई न होने के कारण यौगिक
शब्द है; जिनमें एक शब्द के साथ या तो दूसरा शब्द जोड़ा गया है, या कोई अन्य व्याकरणिक तत्व ।
 
इसी तरह इतिहास के आधार पर शब्दों को क्रमशः चार वर्गों में रखने की परंपरा रही है। वे वर्ग हैं-तत्सम,
तद्भव, देशज और विदेशज ।
 
तत्सम संस्कृत के शुद्ध या अधिकृत शब्द-रूप को कहते रहे हैं जैसे जल, विद्या, नर आदि । तद्भव, संस्कृत
के शुद्ध शब्दों से निकले विकृत या विकसित शब्दों को कहते रहे हैं, जैसे जीभ (जिह्वा) कन्हैया (कृष्ण) साँप (सर्प)
और कान (कर्ण) । विदेशज शब्द उन्हें कहते रहे हैं जो बाहर से आये हों जैसे अंग्रेजी के रेल, मोटर, फोटो या अरबी
के किताब आदि । विदेशज के स्थान पर इन्हें गृहीत या आगत कहना अधिक उपयुक्त लगता है क्योंकि इनके लिये
यह आवश्यक नहीं कि ये विदेशी भाषा के ही हों । दक्षिण की भाषाओं से भी हिंदी में शब्द आए है जैसे ‘दोसा’
शब्द इसी श्रेणी का है। इसके अतिरिक्त देशज शब्द उन्हें कहते हैं जो उपर्युक्त तीन में से किसी में न हो, अर्थात्
जिनकी व्युत्पत्ति का ठीक-ठीक पता न हो और जो उसी क्षेत्र में जन्मा हो । दूसरे शब्दों में जो इन तीनों में न होकर
देश में उत्पन्न या विकसित हुए हों । ‘देशज’ शब्द वस्तुत: निश्चयात्मक नाम है, जबकि इसकी व्युत्पत्ति के बारे में
निश्चय के साथ हम कुछ नहीं जानते । डॉ० भोलानाथ तिवारी जैसे भाषा विद् इसीलिये ऐसे शब्दों के लिये ‘अज्ञात
व्युत्पत्तिक नाम का प्रयोग अधिक समीचीन मानते हैं।
 
इन चारों के अतिरिक्त वर्गीकरण के संदर्भ में कुछ और भी नाम लिये जा सकते हैं। कुछ लोगों ने दृश्यात्मक
शब्द जैसे चमचम, बगबग; प्रतिध्वनि शब्द, जैसे लोटा-ओटा; अनुकरणात्मक शब्द जैसे भोंपू; अनुरणात्मक शब्द जैसे
झनझन, टनटन आदि माने हैं। किंतु वास्तव में ये प्रकृति की दृष्टि से ही भिन्न हैं । इतिहास की दृष्टि से ऊपर जिन
चार वर्गों की चर्चा की गई हैं उनमें ही ये किसी-न-किसी के अंतर्गत रखे जा सकते हैं। ऐसे ही कुछ लोगों ने
तत्समाभास (श्राप, प्रण), तद्भवाभास (दुलहिन, मौसा) को भी अलग स्थान दिया है परंतु इस पद्धति से तो
विदेश्याभास (अखरोट, कलेजा) और देशजाभास (पगड़ी) शब्द भी हो सकते हैं। जाहिर है इतिहास के आधार की
चर्चा करें तो वहाँ ‘आभास’ पर आधारित शीर्षक को रखना पूर्णतः अवैज्ञानिक और असंगत है।
 
इनके अलावा जार्ज ग्रियर्सन तथा धीरेन्द्र वर्मा जैसे भाषा-विज्ञान वेत्ता इस प्रसंग में ‘अर्द्धतत्सम’ नामक एक
अन्य वर्ग का भी उल्लेख करते हैं। जो तत्सम और तद्भव के मध्य आता है। अर्द्धतत्सम शब्द उन्हें कहा जाता
है जो आधुनिक काल में या हाल में संस्कृत से गृहीत तत्सम शब्दों से विकसित हुए हैं। उदाहरण के रूप में कृष्ण
के लिये ‘कान्हा’, कन्हैया, ‘कान्ह’ आदि तो तद्भव हैं परंतु आजकल ‘कृष्ण’ शब्द भी प्रयोग में आकर ‘किशुन’
या ‘किशन’ विकसित हुए । ये किशन या किशुन जैसे शब्द ही अर्द्धतत्सम या अर्द्धतद्भव हैं। परंतु यह विचार ठोस
प्रतीत नहीं होता, क्योंकि यदि शब्द संस्कृत के समान हैं, तो तत्सम या यदि विकसित या विकृत होकर इससे भिन्न
हो गया तो तद्भव (उससे पैदा) हो गया। यह अर्द्ध-अर्द्ध का झमेला आधारहीन है। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे शब्द
भी हैं जो वैदिक काल से चले आ रहे हैं और जिनमें थोड़ा बहुत अंतर आया है। जैसे ‘हल-हर (जोतने का
उपकरण) यहाँ केवल एक ध्वनि परिवर्तित हुई है। आधुनिक काल में परिवर्तित शब्द कृष्ण से किशन हैं जिसमें कृ
से इ, ष से श और ण से न हो गया है। यहाँ अपेक्षया अधिक ध्वनियाँ विकृत हुई हैं।
 
इसी तरह विदेशी शब्दों के संबंध में भी कहा जा सकता है। कोई भी शब्द जो विशिष्ट भाषा-क्षेत्र का नहीं
है अपितु किसी अन्य भाषा से आ गया है, विदेशी है अर्थात् विदेशी का अर्थ है ‘अपने क्षेत्र से बाहर का’। ऐसी
स्थिति में हिंदी में आगत तमिल या बंगला शब्द भी तो उसी प्रकार विदेशी हैं, जिस प्रकार फारसी या अंग्रेजी शब्द ।
जाहिर है। विदेशी के बजाय इन्हें आगत या ‘गृहीत’ कहना अधिक तर्कसंगत और इसलिये समीचीन है इस प्रकार
हिंदी में आगत शब्दों की या शब्द-निर्माण की अनेक दिशाएँ निरूपित की जा सकती है : तत्सम, तद्भव, देशज
व बाहरी- इनमें भी एक ही परिवार की भाषाओं से आये शब्द, भारतीय अन्य भाषा परिवार की भाषाओं से आए
शब्द यथा दखिड परिवार के शब्द, विदेश की भाषाओं में अंग्रेजी, तुर्की, अरबी, फारसी या पुर्तगाली, फ्रांसीसी और
रिक्शा जैसे जापानी शब्द । ऐसे आगत शब्द भाषा को जीवंत बनाते हैं और भाषा की शब्द-संपदा को अधिकाधिक
समृद्ध बनाते हैं।

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