समाज भाषा-विज्ञान

समाज भाषा-विज्ञान

                    समाज भाषा-विज्ञान

भाषा पूर्णतया सामाजिक वस्तु है। व्यक्ति समाज में ही उसे सीखता है और समाज में ही उसका प्रयोग करता है। जाहिर है समाज और भाषा का बड़ा ही घनिष्ठ संबंध है। भाषा अपनी व्यवस्था में समाज के ही अनुरूप होती है। इसलिये उसका विकास भी सामाजिक विकास के समानान्तर चलता है। यही कारण है कि किसी समाज के विषय में उसके द्वारा प्रयुक्त भाषा के आधार पर बहुत कुछ कहा जा सकता है। भारतीय भाषाओं में चाचा, ताऊ, मामा और मौसा जैसे मानवीय संबंधसूचक स्वतंत्र शब्दों का पाया जाना, किंतु यूरोपीय भाषाओं में इनका अभाव इस तथ्य का स्पष्ट निदर्शन करता है कि भारतीय समाज में यूरोपीय समाज की अपेक्षा इन संबंधों का अधिक महत्त्व रहा है।
फारसी भाषा में बड़े लोगों के लिये सम्मानार्थ क्रिया में बहुवचन रूप का प्रयोग इस तथ्य का संकेतक है कि वहाँ की सांमती व्यवस्था में अमीर या बड़े आदमी एक से अधिक सामान्य या निम्न श्रेणी के व्यक्ति के बराबर माने जाते थे। जापान में राजा तथा राजघराने के लोगों के लिये सामान्य भाषा से अलग शब्दों एवं रूपों के प्रयोग इस बात की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं कि वहाँ के समाज में राजा का स्थान बहुत ही विशिष्ट रहा है जो अन्य देशों में प्राय: दुर्लभ है। भाषा और समाज के इसी घनिष्ठ संबंध को देखते हुए भाषा वैज्ञानिक जे० आर० फर्थ ने सन् 1957 में पहले-पहल समाज और भाषा-विज्ञान-दोनों शब्दों को मिलाकर एक अलग भाषावैज्ञानिक शाखा का निर्माण किया ‘समाज-भाषा विज्ञान’ । इस शाखा में भाषा और समाज के संबंधों तथा उससे संबद्ध तथ्यों पर प्रकाश डाला जाता है।
 
समाज भाषा-विज्ञान का पूर्ण एवं व्यवस्थित अध्ययन मोटे रूप से भाषा वैज्ञानिक मूल उपपत्तियों और
शाखाओं के अंतर्गत किया जा सकता है:
 
(क) ध्वनि-विज्ञान
(ख) रूप-विज्ञान
(ग) वाक्य-विज्ञान
(घ) अर्थ-विज्ञान
(ङ) शब्द-विज्ञान
(च) मुहावरे और
(छ) लोकोक्तियाँ एवं कहावतें।
 
                 सामाजिक भेद और भाषिक संरचना:-
 
भाषा में सामाजिक भेद इन सभी क्षेत्र-संदर्भ में दिखाई पड़ता है। शिक्षित-अशिक्षित, उच्चवर्ग, मध्यवर्ग, निम्न वर्ग शिक्षितों में विभिन्न स्तरों, विभिन्न पीढ़ियों, विभिन्न पेशों, विभिन्न प्रकार के जीवन (यथा विद्यार्थी आदि), विभिन्न जातियों (जैसे ब्राह्मण, बनिया, कोइरी), विभिन्न धर्मों (जैसे हिंदू-मूसलमान), स्त्री-पुरुष आदि द्वारा प्रयुक्त एक ही भाषा-ध्वनि (मूल स्वर, संयुक्त स्वर, अनुनासिक स्वर, मूल व्यंजन, संयुक्त व्यंजन, बलाघात सुर-लहर और दीर्घता); रूप-रचना, वाक्य-संरचना, शब्द-प्रयोग, मुहावरे और लोकोक्तियाँ तथा कहावतें आदि की दृष्टि से निश्चितरूपेण थोड़ी-बहुत अलग-अलग होती हैं । वक्ता की बात सुनकर एक सीमा तक यह अनुमान सहजता से लगाया जा सकता
है कि किस सामाजिक स्तर का व्यक्ति बोल रहा है। दो व्यक्तियों की बातचीत सुनकर दोनों के सामाजिक स्तर तथा आपसी संबंध आदि का अनुमान लगाया जाना पूरी तरह मुमकिन है।
 
हिंदी प्रदेश के एक हो गाँव में जमुना और यमुना, व्यक्ति और व्यक्ति, कानुन और कानून, वर्षा और वर्सा, रक्षा और रच्छा, अखबार और अखवार, गरीब और गरीव रोज और रोज, कालेज तथा कालिज, रजिन्नर, रजिन्दर, राजेन्दर-राजेन्द्र परसाद-परशाद-प्रसाद, बरहमन-वाम्हन-ब्राम्हन-ब्राह्मण-ब्राह्मन, सहर और शहर, रपट और रिपोर्ट, लखनऊ और नखलऊ, टीसन और टेसन-इस्टेशन-स्टेशन जैसे हजारों शब्दों में उच्चारण-भेद सामाजिक भेदों की अभिव्यक्ति करते हैं। इस तरह की स्थिति विश्व के अनेक भाषाओं में देखी जा सकती है। रूप के क्षेत्र में भी सामाजिक अंतर होते हैं। दिल्ली को भाषा इस दृष्टि से बड़ी समृद्ध सामग्री प्रस्तुत करती है। रूप के संदर्भ में किया-करा हैं-हैंगे, आना-आइयों, उन्होंने- उन्ने मुझको-मैंने-मेरे को, मुझसे-मेरे से, मुझमें मेरे में, मुझ पर, मेरे पर अथवा देना-दियो के रूप द्रष्टव्य है।
 
इसी तरह वाक्य-रचना तथा शब्दों के अर्थ में भी अंतर मिलता है। यों सर्वाधिक अंतर शब्द प्रयोग में पाया जाता है। गांव में साड़ी-लुग्गा, भोजन-खाना-खयका, कुर्ता-अंगरख घर बखरी आदि शब्द ऐसे ही चलते रहे हैं। जातियों आदि के अतिरिक्त स्त्रियों और पुरुषों द्वारा प्रयुक्त शब्दों में भी बहुत अंतर होता है। मुहावरों-लोक्तियों तथा कहावतों में एक सीमा में पर्याप्त अंतर रहता है। स्त्रियों-पुरुषों द्वारा प्रयुक्त मुहावरों-लोकोक्रियों में भी अंतर रहता है।
 
भाषा के विशिष्ट रूप का उद्भव उसका विशेष प्रकार का विकास तथा उसके शब्द-समूह आदि में परिवर्तन, उस पर अन्य भाषाओं का प्रभाव एवं उसका अन्य भाषाओं पर प्रभाव, परिनिष्ठित भाषा के रूप में उसकी स्वीकृति या अस्वीकृति आदि भाषा विषयक अनेक बातें मूलतः उसके बोलने वालों की सामाजिक स्थिति पर निर्भर करती है।
 
वास्तव में भाषा के एक रूप का परिनिष्ठित मान लिया जाना मूलतः सामाजिक स्वीकृति है। भाषा के
परिनिष्ठित रूप का पैमाना सामाजिक स्वीकृति ही है। जब किसी एक क्षेत्र के समाज को अन्य क्षेत्रों का समाज किसी भी कारण (धर्म, राजनीति आदि) अपनी तुलना में जाने-अनजाने प्रमुखता देने लगता है तो वहाँ की भाषा भी सहज ही शेष समाज के लिये मान्य होने लगती है और धीरे-धीरे वही परिनिष्ठित बन जाती है। देखा गया है कि बहुत से देशों की राजधानी के आस पास की भाषा परिनिष्ठित होती है, इसका भी सामाजिक कारण है।
 
इसी तरह किसी एक भाषा के दूसरी भाषा पर प्रभाव (शब्द, वाक्य-रचना आदि क्षेत्र में) के पीछे भी
सामाजिक कारण होते हैं। ऐसे समाज की भाषा जो किसी भी कारण अन्यों की तुलना में उच्च समझी जाती है; अन्य भाषाओं को बहुत जल्द प्रभावित कर लेती है। इस तरह भाषिक प्रयोगों में सामाजिक दृष्टि से कई स्तर हो जाते हैं। इन स्तरों का मुख्य कारण या आधार समाज में एक-दूसरे के प्रति आदर की भावना को कमी-बेशी है, जो शब्दों, रूपों आदि में अभिव्यक्त होती है। इस तरह के अंतर प्राय: सर्वनामों में बहुत अधिक होते हैं। ऐसे प्रयोग हिंदी और उर्दू में देखे जा सकते हैं: तू, तुम, आप, जनाब, जनावआलो, हुजूर, या बैठना-विराजना-तशरीफ रखना, आना-पधारना-तशरीफ लाना- पवित्र करना, कभी मेरे घर आ आओ/आइये पधारिये। पधारो, तशरीफ लाइए (को) पवित्र कीजिये; नाम या
शुभनाम; गरीब खाना-दौलत खाना: चल-चलो-चलें या चलिये आदि।
 
                              सामाजिक परिवर्तन और भाषा:
 
सामाजिक परिवर्तनों के साथ भाषा में भी परिवर्तन आता है। शब्दों के स्तर पर यह परिवर्तन बहुत स्पष्ट देखा जा सकता है। हिंदी प्रदेश में जहाँपनाह, अन्नदाता, गरीब परवर जैसे शब्द संबोधन के रूप में बहुप्रचलित थे। अब ये सामाजिक व्यवस्था के परिवर्तित रूप के कारण हमारी भाषा के बहुप्रयुक्त शब्द नहीं रह गए हैं। सो, तत्वत: शब्द-समूह में परिवर्तन अनेक दृष्टियों से समाज को विचारधारा तथा रहन-सहन में परिवर्तन का बहुत ही प्रामाणिक सूचक है।
 
इस तरह सामाजिक स्तर को सूक्ष्मता का पता भाषा के सामाजिक स्तरों से चलता है। स्पष्ट है समाज
भाषा-विज्ञान के अध्ययन द्वारा गहराई में जाकर भावों और विचारों को जानने के अतिरिक्त यह भी जाना जा सकता है कि वक्ता की सामाजिक स्थिति, धर्म, जाति, शिक्षा, आय तथा परंपरा आदि की दृष्टि से क्या है, तथा उसका संबंध और सामाजिक स्तर क्या है, जाना जा सकता है। साथ ही भाषा में हुए अनेक परिवर्तनों, भाषाओं के आपसी संबंधों तथा प्रभाव उनके शिष्ट-अशिष्ट, श्लील-अश्लील, मान्य-अमान्य, परिनिष्ठित-ग्राम्य आदि के होने की स्वीकृति जैसी अनेक बातों को भी समाज से जोड़ा जा सकता है।
 
जाहिर है समाज भाषा-विज्ञान में वक्ता की मानसिक और सामाजिक स्थिति का विवेचन किया जाता है। चाम्स्की ने सन् 1957 और 1965 में अपने सिद्धांत ‘ट्रांसफारमेशनल जनरेटिव’ के द्वारा इस ‘समाज भाषा-विज्ञान’ को ठोस आधार दिया।
 
इधर समाज भाषा-विज्ञान के लिये उस उपयुक्त भाषा-वैज्ञानिक सिद्धांत की खोज की जा रही है जिसके आधार पर उसका अध्ययन विश्लेषण किया जा सके । चाम्स्की जैसे भाषा-वैज्ञानिक वाक्य की व्याकरणसम्मतता पर अधिक बल देते हैं जबकि सामाजिक और मानसिक स्थितियों के लिये भी उनके सिद्धांत में स्थान रहना चाहिये था। यह एक तार्किक विडम्बना है कि एक ओर ये सिद्धांत यह मानते है कि मानव सामाजिक प्राणी होने के नाते ही भाषा सीखता है, दूसरी ओर यही सिद्धांत मानव की सामाजिक स्थितियों को उसकी वाक्य रचना से स्वतंत्र और अलग रखते हैं। शास्त्रीय आधार पर भाषा-विज्ञान में ‘समाज’ का पक्ष ठीक से युक्त किया जाना चाहिये । हिन्दी भाषी समाज में ‘प्रणाम’ या आशीर्वाद’ जैसे आचार के नियमों में यह निर्दिष्ट किया जा सकता है कि अनुभव के संदर्भ में कौन
प्रणाम का कर्ता है या आशीर्वाद’ का दाता है। इन नियमों में एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति से क्या सामाजिक रिश्ता है, इसका विचार भी हर हाल में करना ही होगा; तभी हम उचित या अनुचित को समझ पायेंगे।
अस्तु सामाजिक संरचना भाषिक संरचना को अत्यधिक प्रभावित करती है।

Amazon Today Best Offer… all product 25 % Discount…Click Now>>>>

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *