हरिशंकर परसाई

हरिशंकर परसाई

                      हरिशंकर परसाई

हिन्दी के प्रतिबद्ध व्यंग्यकार के रूप में हरिशंकर परसाई अद्वितीय माने जाते
हैं। जीवन के सभी क्षेत्रों में व्याप्त विसंगतियों पर तीव्र प्रहार करनेवाले निर्भीक
किन्तु बेहतर मानवीय समाज के स्वप्नद्रष्टा परसाईजी का जन्म 1924 ई. में
इटारसी (मध्यप्रदेश) के निकट जमानी ग्राम में हुआ था और उन्होंने नागपुर
विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम. ए. किया था। किसी प्रकार की नौकरी का मोह
छोड़कर परसाई ने स्वतंत्र लेखन को ही जीवनचर्या के रूप में चुना । जबलपुर
से वसुधा नाम की साहित्यिक मासिक पत्रिका निकाली, घाटे के बावजूद कई
वर्षों तक उसे चलाया, अंत में परिस्थितियों ने बंद करने के लिए लाचार कर
दिया । अनेक पत्र-पत्रिकाओं में वर्षों तक नियमित स्तंभ लिखे – नई दुनिया
में, सुनो भाई साधो, नई कहानियाँ में पाँचवाँ कॉलम और उलझी उलझी
कल्पना में और अंत में तथा देशबंधु में पूछो परसाई से आदि, जिनकी
लोकप्रियता के बारे में दो मत नहीं हैं ।
 
इनके अतिरिक्त परसाईजी ने बड़ी संख्या में कहानियाँ, उपन्यास एवं
निबन्ध भी लिखे हैं । ये केन्द्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार, मध्यप्रदेश का
शिखर सम्मान आदि अनेक पुरस्कारों से सम्मानित भी हुए हैं। इनकी प्रकाशित
पुस्तकें हैं——हँसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे (कहानी-संग्रह), रानी
नागफनी की कहानी, तट की खोज (उपन्यास); तब की बात और थी,
भूत के पाँव पीछे, बेईमानी की परत, पगडंडियों का जमाना, सदाचार की
ताबीज, शिकायत मुझे भी है, वैष्णव की फिसलन, विकलांग श्रद्धा का
दौर आदि (निबन्ध-संग्रह); परसाई रचनावली शीर्षक से छह खंडों में संकलित
रचनाएँ ।
 
      ठिठुरता हुआ गणतंत्र शीर्षक व्यंग्य रचना के माध्यम से परसाईजी देश
की लोकतांत्रिक व्यवस्था के इस दावे पर व्यंग्य किया है कि देश के सभी राज्य
हर क्षेत्र में तीव्र गति से विकास कर रहे हैं। गणतंत्र दिवस के अवसर पर देश
की राजधानी दिल्ली में हर राज्य की ओर से दिखाई जानेवाली झाँकियाँ अपने
आप में एक बड़ा परिहास होती हैं। पिछले वर्ष राज्य अपने जिन काले कारनामों
के लिए प्रसिद्ध हुए थे, राज्यों को उन्हीं की झाँकी दिखलानी चाहिए, लेकिन
वे तो अपने विकास और श्रेष्ठता प्रदर्शित करने वाली झाँकियाँ दिखलाते हैं ।

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